Vikram Betal Stories In Hindi |विक्रम बेताल की कहानियाँ

Vikram Betal Stories In Hindi |विक्रम बेताल की कहानियाँ हिंदी में

बैताल पच्चीसी – प्रारम्भ की कहानी

बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेन नाम का एक राजा राज करते थे। उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। संयोग से एक दिन राजा की मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनका बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता गया और वह सारे जम्बूद्वीप का राजा बन बैठा। एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए और जिन देशों के नाम उसने सुने हैं, उन्हें देखना चाहिए। सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर, योगी बन कर, राज्य से निकल पड़ा।
उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। एक दिन देवता ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा कि इसे जो भी खायेगा, वह अमर हो जायेगा। ब्रह्मण ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की बात भी बता दी। ब्राह्मणी बोली, “हम अमर होकर क्या करेंगे? हमेशा भीख माँगते रहेंगें। इससे तो मरना ही अच्छा है। तुम इस फल को ले जाकर राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ।”

यह सुनकर ब्राह्मण फल लेकर राजा भर्तृहरि के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। भर्तृहरि ने फल ले लिया और ब्राह्मण को एक लाख रुपये देकर विदा कर दिया। भर्तृहरि अपनी एक रानी को बहुत चाहता था। उसने महल में जाकर वह फल उसी को दे दिया। रानी की मित्रता शहर-कोतवाल से थी। उसने वह फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह उस फल को उस वेश्या को दे आया। वेश्या ने सोचा कि यह फल तो राजा को खाना चाहिए। वह उसे लेकर राजा भर्तृहरि के पास गई और उसे दे दिया। भर्तृहरि ने उसे बहुत-सा धन दिया; लेकिन जब उसने फल को अच्छी तरह से देखा तो पहचान लिया। उसे बड़ी चोट लगी, पर उसने किसी से कुछ कहा नहीं। उसने महल में जाकर रानी से पूछा कि तुमने उस फल का क्या किया। रानी ने कहा, “मैंने उसे खा लिया।” राजा ने वह फल निकालकर दिखा दिया। रानी घबरा गयी और उसने सारी बात सच-सच कह दी। भर्तृहरि ने पता लगाया तो उसे पूरी बात ठीक-ठीक मालूम हो गयी। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने सोचा, यह दुनिया माया-जाल है। इसमें अपना कोई नहीं। वह फल लेकर बाहर आया और उसे धुलवाकर स्वयं खा लिया। फिर राजपाट छोड, योगी का भेस बना, जंगल में तपस्या करने चला गया।

भर्तृहरि के जंगल में चले जाने से विक्रम की गद्दी सूनी हो गयी। जब राजा इन्द्र को यह समाचार मिला तो उन्होंने एक देव को धारा नगरी की रखवाली के लिए भेज दिया। वह रात-दिन वहीं रहने लगा।

भर्तृहरि के राजपाट छोड़कर वन में चले जाने की बात विक्रम को मालूम हुई तो वह लौटकर अपने देश में आया। आधी रात का समय था। जब वह नगर में घुसने लगा तो देव ने उसे रोका। राजा ने कहा, “मैं विक्रम हूँ। यह मेरा राज है। तुम रोकने वाले कौन होते होते?”

देव बोला, “मुझे राजा इन्द्र ने इस नगर की चौकसी के लिए भेजा है। तुम सच्चे राजा विक्रम हो तो आओ, पहले मुझसे लड़ो।”

दोनों में लड़ाई हुई। राजा ने ज़रा-सी देर में देव को पछाड़ दिया। तब देव बोला, “हे राजन्! तुमने मुझे हरा दिया। मैं तुम्हें जीवन-दान देता हूँ।”

इसके बाद देव ने कहा, “राजन्, एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए थे। तुमने राजा के घर में जन्म लिया, दूसरे ने तेली के और तीसरे ने कुम्हार के। तुम यहाँ का राज करते हो, तेली पाताल का राज करता था। कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शम्शान में पिशाच बना सिरस के पेड़ से लटका दिया है। अब वह तुम्हें मारने की फिराक में है। उससे सावधान रहना।”

इतना कहकर देव चला गया और राजा महल में आ गया। राजा को वापस आया देख सबको बड़ी खुशी हुई। नगर में आनन्द मनाया गया। राजा फिर राज करने लगा।

एक दिन की बात है कि शान्तिशील नाम का एक योगी राजा के पास दरबार में आया और उसे एक फल देकर चला गया। राजा को आशंका हुई कि देव ने जिस आदमी को बताया था, कहीं यह वही तो नहीं है! यह सोच उसने फल नहीं खाया, भण्डारी को दे दिया। योगी आता और राजा को एक फल दे जाता।
संयोग से एक दिन राजा अपना अस्तबल देखने गया था। योगी वहीं पहुँच और फल राजा के हाथ में दे दिया। राजा ने उसे उछाला तो वह हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़ा। उसी समय एक बन्दर ने झपटकर उसे उठा लिया और तोड़ डाला। उसमें से एक लाल निकला, जिसकी चमक से सबकी आँखें चौंधिया गयीं। राजा को बड़ा अचरज हुआ। उसने योगी से पूछा, “आप यह लाल मुझे रोज़ क्यों दे जाते हैं?”
योगी ने जवाब दिया, “महाराज! राजा, गुरु, ज्योतिषी, वैद्य और बेटी, इनके घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”
राजा ने भण्डारी को बुलाकर पीछे के सब फल मँगवाये। तुड़वाने पर सबमें से एक-एक लाल निकला। इतने लाल देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। उसने जौहरी को बुलवाकर उनका मूल्य पूछा। जौहरी बोला, “महाराज, ये लाल इतने कीमती हैं कि इनका मोल करोड़ों रुपयों में भी नहीं आँका जा सकता। एक-एक लाल एक-एक राज्य के बराबर है।”
यह सुनकर राजा योगी का हाथ पकड़कर गद्दी पर ले गया। बोला, “योगीराज, आप सुनी हुई बुरी बातें, दूसरों के सामने नहीं कही जातीं।”
राजा उसे अकेले में ले गया। वहाँ जाकर योगी ने कहा, “महाराज, बात यह है कि गोदावरी नदी के किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ। उसके सिद्ध हो जाने पर मेरा मनोरथ पूरा हो जायेगा। तुम एक रात मेरे पास रहोगे तो मंत्र सिद्ध हो जायेगा। एक दिन रात को हथियार बाँधकर तुम अकेले मेरे पास आ जाना।”
राजा ने कहा “अच्छी बात है।”
इसके उपरान्त योगी दिन और समय बताकर अपने मठ में चला गया।
वह दिन आने पर राजा अकेला वहाँ पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”
योगी ने कहा, “राजन्, “यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”
यह सुनकर राजा वहाँ से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ता गया। जब वह मसान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।
राजा ने नीचे आकर पूछा, “तू कौन है?”
राजा का इतना कहना था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा। राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी वह मुर्दा फिर पेड़ पर जा लटका। राजा फिर चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। बोला, “बता, तू कौन है?”
मुर्दा चुप रहा।
तब राजा ने उसे एक चादर में बाँधा और योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है?”
राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”
बेताल बोला, “मैं एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।”
राजा ने उसकी बात मान ली। फिर बेताल बोला, “ पण्डित, चतुर और ज्ञानी, इनके दिन अच्छी-अच्छी बातों में बीतते हैं, जबकि मूर्खों के दिन कलह और नींद में। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”

पापी कौन ? – बेताल पच्चीसी – पहली कहानी

काशी में प्रतापमुकुट नाम का राजा राज्य करता था। उसके वज्रमुकुट नाम का एक बेटा था। एक दिन राजकुमार दीवान के लड़के को साथ लेकर शिकार खेलने जंगल गया। घूमते-घूमते उन्हें तालाब मिला। उसके पानी में कमल खिले थे और हंस किलोल कर रहे थे। किनारों पर घने पेड़ थे, जिन पर पक्षी चहचहा रहे थे। दोनों मित्र वहाँ रुक गये और तालाब के पानी में हाथ-मुँह धोकर ऊपर महादेव के मन्दिर पर गये। घोड़ों को उन्होंने मन्दिर के बाहर बाँध दिया। वो मन्दिर में दर्शन करके बाहर आये तो देखते क्या हैं कि तालाब के किनारे राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई है। दीवान का लड़का तो वहीं एक पेड़ के नीचे बैठा रहा, पर राजकुमार से न रहा गया। वह आगे बढ़ गया। राजकुमारी ने उसकी ओर देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। राजकुमारी भी उसकी तरफ़ देखती रही। फिर उसने किया क्या कि जूड़े में से कमल का फूल निकाला, कान से लगाया, दाँत से कुतरा, पैर के नीचे दबाया और फिर छाती से लगा, अपनी सखियों के साथ चली गयी।
उसके जाने पर राजकुमार निराश हो अपने मित्र के पास आया और सब हाल सुनाकर बोला, “मैं इस राजकुमारी के बिना नहीं रह सकता। पर मुझे न तो उसका नाम मालूम है, न ठिकाना। वह कैसे मिलेगी?”
दीवान के लड़के ने कहा, “राजकुमार, आप इतना घबरायें नहीं। वह सब कुछ बता गयी है।”
राजकुमार ने पूछा, “कैसे?”
वह बोला, “उसने कमल का फूल सिर से उतार कर कानों से लगाया तो उसने बताया कि मैं कर्नाटक की रहनेवाली हूँ। दाँत से कुतरा तो उसका मतलब था कि मैं दंतबाट राजा की बेटी हूँ। पाँव से दबाने का अर्थ था कि मेरा नाम पद्मावती है और छाती से लगाकर उसने बताया कि तुम मेरे दिल में बस गये हो।”
इतना सुनना था कि राजकुमार खुशी से फूल उठा। बोला, “अब मुझे कर्नाटक देश में ले चलो।”
दोनों मित्र वहाँ से चल दिये। घूमते-फिरते, सैर करते, दोनों कई दिन बाद वहाँ पहुँचे। राजा के महल के पास गये तो एक बुढ़िया अपने द्वार पर बैठी चरखा कातती मिली।
उसके पास जाकर दोनों घोड़ों से उतर पड़े और बोले, “माई, हम सौदागर हैं। हमारा सामान पीछे आ रहा है। हमें रहने को थोड़ी जगह दे दो।”
उनकी शक्ल-सूरत देखकर और बात सुनकर बुढ़िया के मन में ममता उमड़ आयी। बोली, “बेटा, तुम्हारा घर है। जब तक जी में आए, रहो।”
दोनों वहीं ठहर गये। दीवान के बेटे ने उससे पूछा, “माई, तुम क्या करती हो? तुम्हारे घर में कौन-कौन है? तुम्हारी गुज़र कैसे होती है?”
बुढ़िया ने जवाब दिया, “बेटा, मेरा एक बेटा है जो राजा की चाकरी में है। मैं राजा की बेटी पह्मावती की धाय थी। बूढ़ी हो जाने से अब घर में रहती हूँ। राजा खाने-पीने को दे देता है। दिन में एक बार राजकुमारी को देखने महल में जाती हूँ।”
राजकुमार ने बुढ़िया को कुछ धन दिया और कहा, “माई, कल तुम वहाँ जाओ तो राजकुमारी से कह देना कि जेठ सुदी पंचमी को तुम्हें तालाब पर जो राजकुमार मिला था, वह आ गया है।”
अगले दिन जब बुढ़िया राजमहल गयी तो उसने राजकुमार का सन्देशा उसे दे दिया। सुनते ही राजकुमारी ने गुस्सा होंकर हाथों में चन्दन लगाकर उसके गाल पर तमाचा मारा और कहा, “मेरे घर से निकल जा।”
बुढ़िया ने घर आकर सब हाल राजकुमार को कह सुनाया। राजकुमार हक्का-बक्का रह गया। तब उसके मित्र ने कहा, “राजकुमार, आप घबरायें नहीं, उसकी बातों को समझें। उसने देसों उँगलियाँ सफ़ेद चन्दन में मारीं, इससे उसका मतलब यह है कि अभी दस रोज़ चाँदनी के हैं। उनके बीतने पर मैं अँधेरी रात में मिलूँगी।”
दस दिन के बाद बुढ़िया ने फिर राजकुमारी को ख़बर दी तो इस बार उसने केसर के रंग में तीन उँगलियाँ डुबोकर उसके मुँह पर मारीं और कहा, “भाग यहाँ से।”
बुढ़िया ने आकर सारी बात सुना दी। राजकुमार शोक से व्याकुल हो गया। दीवान के लड़के ने समझाया, “इसमें हैरान होने की क्या बात है? उसने कहा है कि मुझे मासिक धर्म हो रहा है। तीन दिन और ठहरो।”
तीन दिन बीतने पर बुढ़िया फिर वहाँ पहुँची। इस बार राजकुमारी ने उसे फटकार कर पच्छिम की खिड़की से बाहर निकाल दिया। उसने आकर राजकुमार को बता दिया। सुनकर दीवान का लड़का बोला, “मित्र, उसने आज रात को तुम्हें उस खिड़की की राह बुलाया है।”
मारे खुशी के राजकुमार उछल पड़ा। समय आने पर उसने बुढ़िया की पोशाक पहनी, इत्र लगाया, हथियार बाँधे। दो पहर रात बीतने पर वह महल में जा पहुँचा और खिड़की में से होकर अन्दर पहुँच गया। राजकुमारी वहाँ तैयार खड़ी थी। वह उसे भीतर ले गयी।
अन्दर के हाल देखकर राजकुमार की आँखें खुल गयीं। एक-से-एक बढ़कर चीजें थीं। रात-भर राजकुमार राजकुमारी के साथ रहा। जैसे ही दिन निकलने को आया कि राजकुमारी ने राजकुमार को छिपा दिया और रात होने पर फिर बाहर निकाल लिया। इस तरह कई दिन बीत गये। अचानक एक दिन राजकुमार को अपने मित्र की याद आयी। उसे चिन्ता हुई कि पता नहीं, उसका क्या हुआ होगा। उदास देखकर राजकुमारी ने कारण पूछा तो उसने बता दिया। बोला, “वह मेरा बड़ा प्यारा दोस्त हैं बड़ा चतुर है। उसकी होशियारी ही से तो तुम मुझे मिल पाई हो।”
राजकुमारी ने कहा, “मैं उसके लिए बढ़िय-बढ़िया भोजन बनवाती हूँ। तुम उसे खिलाकर, तसल्ली देकर लौट आना।”
खाना साथ में लेकर राजकुमार अपने मित्र के पास पहुँचा। वे महीने भर से मिले नहीं। थे, राजकुमार ने मिलने पर सारा हाल सुनाकर कहा कि राजकुमारी को मैंने तुम्हारी चतुराई की सारी बातें बता दी हैं, तभी तो उसने यह भोजन बनाकर भेजा है।
दीवान का लड़का सोच में पड़ गया। उसने कहा, “यह तुमने अच्छा नहीं किया। राजकुमारी समझ गयी कि जब तक मैं हूँ, वह तुम्हें अपने बस में नहीं रख सकती। इसलिए उसने इस खाने में ज़हर मिलाकर भेजा है।”
यह कहकर दीवान के लड़के ने थाली में से एक लड्डू उठाकर कुत्ते के आगे डाल दिया। खाते ही कुत्ता मर गया।
राजकुमार को बड़ा बुरा लगा। उसने कहा, “ऐसी स्त्री से भगवान् बचाये! मैं अब उसके पास नहीं जाऊँगा।”
दीवान का बेटा बोला, “नहीं, अब ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे हम उसे घर ले चलें। आज रात को तुम वहाँ जाओ। जब राजकुमारी सो जाये तो उसकी बायीं जाँघ पर त्रिशूल का निशान बनाकर उसके गहने लेकर चले आना।”
राजकुमार ने ऐसा ही किया। उसके आने पर दीवान का बेटा उसे साथ ले, योगी का भेस बना, मरघट में जा बैठा और राजकुमार से कहा कि तुम ये गहने लेकर बाज़ार में बेच आओ। कोई पकड़े तो कह देना कि मेरे गुरु के पास चलो और उसे यहाँ ले आना।
राजकुमार गहने लेकर शहर गया और महल के पास एक सुनार को उन्हें दिखाया। देखते ही सुनार ने उन्हें पहचान लिया और कोतवाल के पास ले गया। कोतवाल ने पूछा तो उसने कह दिया कि ये मेरे गुरु ने मुझे दिये हैं। गुरु को भी पकड़वा लिया गया। सब राजा के सामने पहुँचे।
राजा ने पूछा, “योगी महाराज, ये गहने आपको कहाँ से मिले?”
योगी बने दीवान के बेटे ने कहा, “महाराज, मैं मसान में काली चौदस को डाकिनी-मंत्र सिद्ध कर रहा था कि डाकिनी आयी। मैंने उसके गहने उतार लिये और उसकी बायीं जाँघ में त्रिशूल का निशान बना दिया।”
इतना सुनकर राजा महल में गया और उसने रानी से कहा कि पद्मावती की बायीं जाँघ पर देखो कि त्रिशूल का निशान तो नहीं है। रानी देखा, तो था। राजा को बड़ा दु:ख हुआ। बाहर आकर वह योगी को एक ओर ले जाकर बोला, “महाराज, धर्मशास्त्र में खोटी स्त्रियों के लिए क्या दण्ड है?”
योगी ने जवाब दिया, “राजन्, ब्राह्मण, गऊ, स्त्री, लड़का और अपने आसरे में रहनेवाले से कोई खोटा काम हो जाये तो उसे देश-निकाला दे देना चाहिए।” यह सुनकर राजा ने पद्मावती को डोली में बिठाकर जंगल में छुड़वा दिया। राजकुमार और दीवान का बेटा तो ताक में बैठे ही थे। राजकुमारी को अकेली पाकर साथ ले अपने नगर में लौट आये और आनंद से रहने लगे।
इतनी बात सुनाकर बेताल बोला, “राजन्, यह बताओ कि पाप किसको लगा है?”
राजा ने कहा, “पाप तो राजा को लगा। दीवान के बेटे ने अपने स्वामी का काम किया। कोतवाल ने राजा को कहना माना और राजकुमार ने अपना मनोरथ सिद्ध किया। राजा ने पाप किया, जो बिना विचारे उसे देश-निकाला दे दिया।”
राजा का इतना कहना था कि बेताल फिर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा वापस गया और बेताल को लेकर चल दिया। बेताल बोला, “राजन्, सुनो, एक कहानी और सुनाता हूँ।”

पति कौन ? बेताल पच्चीसी – दूसरी कहानी

यमुना के किनारे धर्मस्थान नामक एक नगर था। उस नगर में गणाधिप नाम का राजा राज करता था। उसी में केशव नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था। ब्राह्मण यमुना के तट पर जप-तप किया करता था। उसकी एक पुत्री थी, जिसका नाम मालती था। वह बड़ी रूपवती थी। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो उसके माता, पिता और भाई को चिन्ता हुई। संयोग से एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया। लड़की की माँ ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी लडकी का ब्याह करूँगी। होनहार की बात कि उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने उस लड़के को भी यही वचन दे दिया। उधर ब्राह्मण का लड़का जहाँ पढ़ने गया था, वहाँ वह एक लड़के से यही वादा कर आया।
कुछ समय बाद बाप-बेटे घर में इकट्ठे हुए तो देखते क्या हैं कि वहाँ एक तीसरा लड़का और मौजूद है। दो उनके साथ आये थे। अब क्या हो? ब्राह्मण, उसका लड़का और ब्राह्मणी बड़े सोच में पड़े। दैवयोग से हुआ क्या कि लड़की को साँप ने काट लिया और वह मर गयी। उसके बाप, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भाग-दौड़ की, ज़हर झाड़नेवालों को बुलाया, पर कोई नतीजा न निकला। सब अपनी-अपनी करके चले गये।
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दु:खी होकर वे उस लड़की को श्मशान में ले गये और क्रिया-कर्म कर आये। तीनों लड़कों में से एक ने तो उसकी हड्डियाँ चुन लीं और फकीर बनकर जंगल में चला गया। दूसरे ने राख की गठरी बाँधी और वहीं झोपड़ी डालकर रहने लगा। तीसरा योगी होकर देश-देश घुमने लगा।
एक दिन की बात है, वह तीसरा लड़का घूमते-घामते किसी नगर में पहुँचा और एक ब्राह्मणी के घर भोजन करने बैठा। जैसे ही उस घर की ब्राह्मणी भोजन परोसने आयी कि उसके छोटे लड़के ने उसका आँचल पकड़ लिया। ब्राह्मणी से अपना आँचल छुड़ता नहीं था। ब्राह्मणी को बड़ा गुस्सा आया। उसने अपने लड़के को झिड़का, मारा-पीटा, फिर भी वह न माना तो ब्राह्मणी ने उसे उठाकर जलते चूल्हें में पटक दिया। लड़का जलकर राख हो गया। ब्राह्मण बिना भोजन किये ही उठ खड़ा हुआ। घरवालों ने बहुतेरा कहा, पर वह भोजन करने के लिए राजी न हुआ। उसने कहा जिस घर में ऐसी राक्षसी हो, उसमें मैं भोजन नहीं कर सकता।
इतना सुनकर वह आदमी भीतर गया और संजीवनी विद्या की पोथी लाकर एक मन्त्र पढ़ा। जलकर राख हो चुका लड़का फिर से जीवित हो गया।
यह देखकर ब्राह्मण सोचने लगा कि अगर यह पोथी मेरे हाथ पड़ जाये तो मैं भी उस लड़की को फिर से जिला सकता हूँ। इसके बाद उसने भोजन किया और वहीं ठहर गया। जब रात को सब खा-पीकर सो गये तो वह ब्राह्मण चुपचाप वह पोथी लेकर चल दिया। जिस स्थान पर उस लड़की को जलाया गया था, वहाँ जाकर उसने देखा कि दूसरे लड़के वहाँ बैठे बातें कर रहे हैं। इस ब्राह्मण के यह कहने पर कि उसे संजीवनी विद्या की पोथी मिल गयी है और वह मन्त्र पढ़कर लड़की को जिला सकता है, उन दोनों ने हड्डियाँ और राख निकाली। ब्राह्मण ने जैसे ही मंत्र पढ़ा, वह लड़की जी उठी। अब तीनों उसके पीछे आपस में झगड़ने लगे।
इतना कहकर बेताल बोला, “राजा, बताओ कि वह लड़की किसकी स्त्री होनी चाहिए?”
राजा ने जवाब दिया, “जो वहाँ कुटिया बनाकर रहा, उसकी।”
बेताल ने पूछा, “क्यों?”
राजा बोला, “जिसने हड्डियाँ रखीं, वह तो उसके बेटे के बराबर हुआ। जिसने विद्या सीखकर जीवन-दान दिया, वह बाप के बराबर हुआ। जो राख लेकर रमा रहा, वही उसकी हक़दार है।”
राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा को फिर लौटना पड़ा और जब वह उसे लेकर चला तो बेताल ने तीसरी कहानी सुनायी।

पुण्य किसका ? – बेताल पच्चीसी – तीसरी कहानी

वर्धमान नगर में रूपसेन नाम का राजा राज करता था। एक दिन उसके यहाँ वीरवर नाम का एक राजपूत नौकरी के लिए आया। राजा ने उससे पूछा कि उसे ख़र्च के लिए क्या चाहिए तो उसने जवाब दिया, हज़ार तोले सोना। सुनकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा ने पूछा, “तुम्हारे साथ कौन-कौन है?” उसने जवाब दिया, “मेरी स्त्री, बेटा और बेटी।” राजा को और भी अचम्भा हुआ। आख़िर चार जने इतने धन का क्या करेंगे? फिर भी उसने उसकी बात मान ली।
उस दिन से वीरवर रोज हज़ार तोले सोना भण्डारी से लेकर अपने घर आता। उसमें से आधा ब्राह्मणों में बाँट देता, बाकी के दो हिस्से करके एक मेहमानों, वैरागियों और संन्यासियों को देता और दूसरे से भोजन बनवाकर पहले ग़रीबों को खिलाता, उसके बाद जो बचता, उसे स्त्री-बच्चों को खिलाता, आप खाता। काम यह था कि शाम होते ही ढाल-तलवार लेकर राज के पलंग की चौकीदारी करता। राजा को जब कभी रात को ज़रूरत होती, वह हाज़िर रहता।
एक आधी रात के समय राजा को मरघट की ओर से किसी के रोने की आवाज़ आयी। उसने वीरवर को पुकारा तो वह आ गया। राजा ने कहा, “जाओ, पता लगाकर आओ कि इतनी रात गये यह कौन रो रहा है ओर क्यों रो रहा है?”
वीरवर तत्काल वहाँ से चल दिया। मरघट में जाकर देखता क्या है कि सिर से पाँव तक एक स्त्री गहनों से लदी कभी नाचती है, कभी कूदती है और सिर पीट-पीटकर रोती है। लेकिन उसकी आँखों से एक बूँद आँसू की नहीं निकलती। वीरवर ने पूछा, “तुम कौन हो? क्यों रोती हो?”
उसने कहा, “मैं राज-लक्ष्मी हूँ। रोती इसलिए हूँ कि राजा विक्रम के घर में खोटे काम होते हैं, इसलिए वहाँ दरिद्रता का डेरा पड़ने वाला है। मैं वहाँ से चली जाऊँगी और राजा दु:खी होकर एक महीने में मर जायेगा।”
सुनकर वीरवर ने पूछा, “इससे बचने का कोई उपाय है!”
स्त्री बोली, “हाँ, है। यहाँ से पूरब में एक योजन पर एक देवी का मन्दिर है। अगर तुम उस देवी पर अपने बेटे का शीश चढ़ा दो तो विपदा टल सकती है। फिर राजा सौ बरस तक बेखटके राज करेगा।”
वीरवर घर आया और अपनी स्त्री को जगाकर सब हाल कहा। स्त्री ने बेटे को जगाया, बेटी भी जाग पड़ी। जब बालक ने बात सुनी तो वह खुश होकर बोला, “आप मेरा शीश काटकर ज़रूर चढ़ा दें। एक तो आपकी आज्ञा, दूसरे स्वामी का काम, तीसरे यह देह देवता पर चढ़े, इससे बढ़कर बात और क्या होगी! आप जल्दी करें।”
वीरवर ने अपनी स्त्री से कहा, “अब तुम बताओ।”
स्त्री बोली, “स्त्री का धर्म पति की सेवा करने में है।”
निदान, चारों जने देवी के मन्दिर में पहुँचे। वीरवर ने हाथ जोड़कर कहा, “हे देवी, मैं अपने बेटे की बलि देता हूँ। मेरे राजा की सौ बरस की उम्र हो।”
इतना कहकर उसने इतने ज़ोर से खांडा मारा कि लड़के का शीश धड़ से अलग हो गया। भाई का यह हाल देख कर बहन ने भी खांडे से अपना सिर अलग कर डाला। बेटा-बेटी चले गये तो दु:खी माँ ने भी उन्हीं का रास्ता पकड़ा और अपनी गर्दन काट दी। वीरवर ने सोचा कि घर में कोई नहीं रहा तो मैं ही जीकर क्या करूँगा। उसने भी अपना सिर काट डाला। राजा को जब यह मालूम हुआ तो वह वहाँ आया। उसे बड़ा दु:ख हुआ कि उसके लिए चार प्राणियों की जान चली गयी। वह सोचने लगा कि ऐसा राज करने से धिक्कार है! यह सोच उसने तलवार उठा ली और जैसे ही अपना सिर काटने को हुआ कि देवी ने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया। बोली, “राजन्, मैं तेरे साहस से प्रसन्न हूँ। तू जो वर माँगेगा, सो दूँगी।”
राजा ने कहा, “देवी, तुम प्रसन्न हो तो इन चारों को जिला दो।”
देवी ने अमृत छिड़ककर उन चारों को फिर से जिला दिया।
इतना कहकर बेताल बोला, राजा, बताओ, सबसे ज्यादा पुण्य किसका हुआ?”
राजा बोला, “राजा का।”
बेताल ने पूछा, “क्यों?”
राजा ने कहा, “इसलिए कि स्वामी के लिए चाकर का प्राण देना धर्म है; लेकिन चाकर के लिए राजा का राजपाट को छोड़, जान को तिनके के समान समझकर देने को तैयार हो जाना बहुत बड़ी बात है।”
यह सुन बेताल ग़ायब हो गया और पेड़ पर जा लटका। बेचारा राजा दौड़ा-दौड़ा वहाँ पहुँचा ओर उसे फिर पकड़कर लाया तो बोताल ने चौथी कहानी कही।

ज्यादा पापी कौन ? – बेताल पच्चीसी – चौथी कहानी ! 

Vikram-Betal Stories In Hindi – Fourth Story
भोगवती नाम की एक नगरी थी। उसमें राजा रूपसेन राज करता था। उसके पास चिन्तामणि नाम का एक तोता था। एक दिन राजा ने उससे पूछा, “हमारा ब्याह किसके साथ होगा?”

तोते ने कहा, “मगध देश के राजा की बेटी चन्द्रावती के साथ होगा।” राजा ने ज्योतिषी को बुलाकर पूछा तो उसने भी यही कहा।

उधर मगध देश की राज-कन्या के पास एक मैना थी। उसका नाम था मदन मञ्जरी। एक दिन राज-कन्या ने उससे पूछा कि मेरा विवाह किसके साथ होगा तो उसने कह दिया कि भोगवती नगर के राजा रूपसेन के साथ।

इसके बाद दोनों को विवाह हो गया। रानी के साथ उसकी मैना भी आ गयी। राजा-रानी ने तोता-मैना का ब्याह करके उन्हें एक पिंजड़े में रख दिया।

एक दिन की बात कि तोता-मैना में बहस हो गयी। मैना ने कहा, “आदमी बड़ा पापी, दग़ाबाज़ और अधर्मी होता है।” तोते ने कहा, “स्त्री झूठी, लालची और हत्यारी होती है।” दोनों का झगड़ा बढ़ गया तो राजा ने कहा, “क्या बात है, तुम आपस में लड़ते क्यों हो?”

मैना ने कहा, “महाराज, मर्द बड़े बुरे होते हैं।”

इसके बाद मैना ने एक कहानी सुनायी।

इलापुर नगर में महाधन नाम का एक सेठ रहता था। विवाह के बहुत दिनों के बाद उसके घर एक लड़का पैदा हुआ। सेठ ने उसका बड़ी अच्छी तरह से लालन-पालन किया, पर लड़का बड़ा होकर जुआ खेलने लगा। इस बीच सेठ मर गया। लड़के ने अपना सारा धन जुए में खो दिया। जब पास में कुछ न बचा तो वह नगर छोड़कर चन्द्रपुरी नामक नगरी में जा पहुँचा। वहाँ हेमगुप्त नाम का साहूकार रहता था। उसके पास जाकर उसने अपने पिता का परिचय दिया और कहा कि मैं जहाज़ लेकर सौदागरी करने गया था। माल बेचा, धन कमाया; लेकिन लौटते में समुद्र में ऐसा तूफ़ान आया कि जहाज़ डूब गया और मैं जैसे-तैसे बचकर यहाँ आ गया।

उस सेठ के एक लड़की थी रत्नावती। सेठ को बड़ी खुशी हुई कि घर बैठे इतना अच्छा लड़का मिल गया। उसने उस लड़के को अपने घर में रख लिया और कुछ दिन बाद अपनी लड़की से उसका ब्याह कर दिया। दोनों वहीं रहने लगे। अन्त में एक दिन वहाँ से बिदा हुए। सेठ ने बहुत-सा धन दिया और एक दासी को उनके साथ भेज दिया।

रास्ते में एक जंगल पड़ता था। वहाँ आकर लड़के ने स्त्री से कहा, “यहाँ बहुत डर है, तुम अपने गहने उतारकर मेरी कमर में बाँध दो, लड़की ने ऐसा ही किया। इसके बाद लड़के ने कहारों को धन देकर डोले को वापस करा दिया और दासी को मारकर कुएँ में डाल दिया। फिर स्त्री को भी कुएँ में पटककर आगे बढ़ गया।

स्त्री रोने लगी। एक मुसाफ़िर उधर जा रहा था। जंगल में रोने की आवाज़ सुनकर वह वहाँ आया उसे कुएँ से निकालकर उसके घर पहुँचा दिया। स्त्री ने घर जाकर माँ-बाप से कह दिया कि रास्ते में चोरों ने हमारे गहने छीन लिये और दासी को मारकर, मुझे कुएँ में ढकेलकर, भाग गये। बाप ने उसे ढाढस बँधाया और कहा कि तू चिन्ता मत कर। तेरा स्वामी जीवित होगा और किसी दिन आ जायेगा।

उधर वह लड़का जेवर लेकर शहर पहुँचा। उसे तो जुए की लत लगी थी। वह सारे गहने जुए में हार गया। उसकी बुरी हालत हुई तो वह यह बहाना बनाकर कि उसके लड़का हुआ है, फिर अपनी ससुराल चला। वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले उसकी स्त्री मिली। वह बड़ी खुश हुई। उसने पति से कहा, “आप कोई चिन्ता न करें, मैंने यहाँ आकर दूसरी ही बात कही है।” जो कहा था, वह उसने बता दिया।

सेठ अपने जमाई से मिलकर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे बड़ी अच्छी तरह से घर में रखा।

कुछ दिन बाद एक रोज़ जब वह लड़की गहने पहने सो रही थी, उसने चुपचाप छुरी से उसे मार डाला और उसके गहने लेकर चम्पत हो गया।

मैना बोली, “महाराज, यह सब मैंने अपनी आँखों से देखा। ऐसा पापी होता है आदमी!”

राजा ने तोते से कहा, “अब तुम बताओ कि स्त्री क्यों बुरी होती है?”

इस पर तोते ने यह कहानी सुनायी।

कंचनपुर में सागरदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके श्रीदत्त नाम का एक लड़का था। वहाँ से कुछ दूर पर एक और नगर था श्रीविजयपुर। उसमें सोमदत्त नाम का सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी वह श्रीदत्त को ब्याही थी। ब्याह के बाद श्रीदत्त व्यापार करने परदेस चला गया। बारह बरस हो गये और वह न आया तो जयश्री व्याकुल होने लगी। एक दिन वह अपनी अटारी पर खड़ी थी कि एक आदमी उसे दिखाई दिया। उसे देखते ही वह उस पर मोहित हो गयी। उसने उसे अपनी सखी के घर बुलवा लिया। रात होते ही वह उस सखी के घर चली जाती और रात-भर वहाँ रहकर दिन निकलने से पहले ही लौट आती। इस तरह बहुत दिन बीत गये।

इस बीच एक दिन उसका पति परदेस से लौट आया। स्त्री बड़ी दु:खी हुईं अब वह क्या करे? पति हारा-थका था। जल्दी ही उसकी आँख लग गई और स्त्री उठकर अपने दोस्त के पास चल दी।

रास्ते में एक चोर खड़ा था। वह देखने लगा कि स्त्री कहाँ जाती है। धीरे-धीरे वह सहेली के मकान पर पहुँची। चोर भी पीछे-पीछे गया। संयोग से उस आदमी को साँप ने काट लिया था ओर वह मरा पड़ा था। स्त्री ने समझा सो रहा है। वहीं आँगन में पीपल का एक पेड़ था, जिस पर एक पिशाच बैठा यह लीला देख रहा था। उसने उस आदमी के शरीर में प्रवेश करके उस स्त्री की नाक काट ली औरा फिर उस आदमी की देह से निकलकर पेड़ पर जा बैठा। स्त्री रोती हुई अपनी सहेली के पास गयी। सहेली ने कहा कि तुम अपने पति के पास जाओ ओर वहाँ बैठकर रोने लगो। कोई पूछे तो कह देना कि पति ने नाक काट ली है।

उसने ऐसा ही किया। उसका रोना सुनकर लोग इकट्ठे हो गये। आदमी जाग उठा। उसे सारा हाल मालूम हुआ तो वह बड़ा दु:खी हुआ। लड़की के बाप ने कोतवाल को ख़बर दे दी। कोतवाल उन सबको राजा के पास ले गया। लड़की की हालत देखकर राजा को बड़ा गुस्सा आया। उसने कहा, “इस आदमी को सूली पर लटका दो।”

वह चोर वहाँ खड़ा था। जब उसने देखा कि एक बेक़सूर आदमी को सूली पर लटकाया जा रहा है तो उसने राजा के सामने जाकर सब हाल सच-सच बता दिया। बोला, “अगर मेरी बात का विश्वास न हो तो जाकर देख लीजिए, उस आदमी के मुँह में स्त्री की नाक है।”

राजा ने दिखवाया तो बात सच निकली।

इतना कहकर तोता बोला, “हे राजा! स्त्रियाँ ऐसी होती हैं! राजा ने उस स्त्री का सिर मुँडवाकर, गधे पर चढ़ाकर, नगर में घुमवाया और शहर से बाहर छुड़वा दिया।”

यह कहानी सुनाकर बेताल बोला, “राजा, बताओ कि दोनों में ज्यादा पापी कौन है?”

राजा ने कहा, “स्त्री।”

बेताल ने पूछा, “कैसे?”

राजा ने कहा, “मर्द कैसा ही दुष्ट हो, उसे धर्म का थोड़ा-बहुत विचार रहता ही है। स्त्री को नहीं रहता। इसलिए वह अधिक पापिन है।”

राजा के इतना कहते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा लौटकर गया और उसे पकड़कर लाया। रास्ते में बेताल ने पाँचवीं कहानी सुनायी।

असली वर कौन? – बेताल पच्चीसी – पाँचवीं कहानी

उज्जैन में महाबल नाम का एक राजा रहता था। उसके हरिदास नाम का एक दूत था जिसके महादेवी नाम की बड़ी सुन्दर कन्या थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो हरिदास को बहुत चिन्ता होने लगी। इसी बीच राजा ने उसे एक दूसरे राजा के पास भेजा। कई दिन चलकर हरिदास वहाँ पहुँचा। राजा ने उसे बड़ी अच्छी तरह से रखा। एक दिन एक ब्राह्मण हरिदास के पास आया। बोला, “तुम अपनी लड़की मुझे दे दो।”
हरिदास ने कहाँ, “मैं अपनी लड़की उसे दूँगा, जिसमें सब गुण होंगे।”
ब्राह्मण ने कहा, “मेरे पास एक ऐसा रथ है, जिस पर बैठकर जहाँ चाहो, घड़ी-भर में पहुँच जाओगे।”
हरिदास बोला, “ठीक है। सबेरे उसे ले आना।”
अगले दिन दोनों रथ पर बैठकर उज्जैन आ पहुँचे। दैवयोग से उससे पहले हरिदास का लड़का अपनी बहन को किसी दूसरे को और हरिदास की स्त्री अपनी लड़की को किसी तीसरे को देने का वादा कर चुकी थी। इस तरह तीन वर इकट्ठे हो गये। हरिदास सोचने लगा कि कन्या एक है, वह तीन हैं। क्या करे! इसी बीच एक राक्षस आया और कन्या को उठाकर विंध्याचल पहाड़ पर ले गया। तीनों वरों में एक ज्ञानी था। हरिदास ने उससे पूछा तो उसने बता दिया कि एक राक्षस लड़की को उड़ा ले गया है और वह विंध्याचल पहाड़ पर है।
दूसरे ने कहा, “मेरे रथ पर बैठकर चलो। ज़रा सी देरी में वहाँ पहुँच जायेंगे।”
तीसरा बोला, “मैं शब्दवेधी तीर चलाना जानता हूँ। राक्षस को मार गिराऊँगा।”
वे सब रथ पर चढ़कर विंध्याचल पहुँचे और राक्षस को मारकर लड़की को बचा जाये।
इतना कहकर बेताल बोला “हे राजन्! बताओ, वह लड़की उन तीनों में से किसको मिलनी चाहिए?”
राजा ने कहा, “जिसने राक्षस को मारा, उसकों मिलनी चाहिए, क्योंकि असली वीरता तो उसी ने दिखाई। बाकी दो ने तो मदद की।”
राजा का इतना कहना था कि बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा फिर उसे लेकर आया तो रास्ते में बेताल ने छठी कहानी सुनायी।

पत्नी किसकी ? – बेताल पच्चीसी – छठी कहानी

किसका पुण्य बड़ा ? – बेताल पच्चीसी – सातवीं कहानी

मिथलावती नाम की एक नगरी थी। उसमें गुणधिप नाम का राजा राज करता था। उसकी सेवा करने के लिए दूर देश से एक राजकुमार आया। वह बराबर कोशिश करता रहा, लेकिन राजा से उनकी भेंट न हुई। जो कुछ वह अपने साथ लाया था, वह सब बराबर हो गया।
एक दिन राजा शिकार खेलने चला। राजकुमार भी साथ हो लिया। चलते-चलते राजा एक वन में पहुँचा। वहाँ उसके नौकर-चाकर बिछुड़ गये। राजा के साथ अकेला वह राजकुमार रह गया। उसने राजा को रोका। राजा ने उसकी ओर देखा तो पूछा, “तू इतना कमजोर क्यों हो रहा है।” उसने कहा, “इसमें मेरे कर्म का दोष है। मैं जिस राजा के पास रहता हूँ, वह हजारों को पालता है, पर उसकी निगाह मेरी और नहीं जाती। राजन् छ: बातें आदमी को हल्का करती हैं—खोटे नर की प्रीति, बिना कारण हँसी, स्त्री से विवाद, असज्जन स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और बिना संस्कृत की भाषा। और हे राजा, ये पाँच चीज़ें आदमी के पैदा होते ही विधाता उसके भाग्य में लिख देता है—आयु, कर्म, धन, विद्या और यश। राजन्, जब तक आदमी का पुण्य उदय रहता है, तब तक उसके बहुत-से दास रहते हैं। जब पुण्य घट जाता है तो भाई भी बैरी हो जाते हैं। पर एक बात है, स्वामी की सेवा अकारथ नहीं जाती। कभी-न-कभी फल मिल ही जाता है।”
यह सुन राजा के मन पर उसका बड़ा असर हुआ। कुछ समय घूमने-घामने के बाद वे नगर में लौट आये। राजा ने उसे अपनी नौकरी में रख लिया। उसे बढ़िया-बढ़िया कपड़े और गहने दिये।
एक दिन राजकुमार किसी काम से कहीं गया। रास्ते में उसे देवी का मन्दिर मिला। उसने अन्दर जाकर देवी की पूजा की। जब वह बाहर निकला तो देखता क्या है, उसके पीछे एक सुन्दर स्त्री चली आ रही है। राजकुमार उसे देखते ही उसकी ओर आकर्षित हो गया। स्त्री ने कहा, “पहले तुम कुण्ड में स्नान कर आओ। फिर जो कहोगे, सो करूँगी।”
इतना सुनकर राजकुमार कपड़े उतारकर जैसे ही कुण्ड में घुसा और गोता लगाया कि अपने नगर में पहुँच गया। उसने जाकर राजा को सारा हाल कह-सुनाया। राजा ने कहा, “यह अचरज मुझे भी दिखाओ।”
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दोनों घोड़ों पर सवार होकर देवी के मन्दिर पर आये। अन्दर जाकर दर्शन किये और जैसे ही बाहर निकले कि वह स्त्री प्रकट हो गयी। राजा को देखते ही बोली, “महाराज, मैं आपके रूप पर मुग्ध हूँ। आप जो कहेंगे, वही करुँगी।”
राजा ने कहा, “ऐसी बात है तो तू मेरे इस सेवक से विवाह कर ले।”
स्त्री बोली, “यह नहीं होने का। मैं तो तुम्हें चाहती हूँ।”
राजा ने कहा, “सज्जन लोग जो कहते हैं, उसे निभाते हैं। तुम अपने वचन का पालन करो।”
इसके बाद राजा ने उसका विवाह अपने सेवक से करा दिया।
इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजन्! यह बताओ कि राजा और सेवक, दोनों में से किसका काम बड़ा हुआ?”
राजा ने कहा, “नौकर का।”
बेताल ने पूछा, “सो कैसे?”
राजा बोला, “उपकार करना राजा का तो धर्म ही था। इसलिए उसके उपकार करने में कोई खास बात नहीं हुई। लेकिन जिसका धर्म नहीं था, उसने उपकार किया तो उसका काम बढ़कर हुआ?”
इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा जब उसे पुन: लेकर चला तो उसने आठवीं कहानी सुनायी।

सबसे बढ़कर कौन ? – बेताल पच्चीसी – आठवीं कहानी

अंग देश के एक गाँव मे एक धनी ब्राह्मण रहता था। उसके तीन पुत्र थे। एक बार ब्राह्मण ने एक यज्ञ करना चाहा। उसके लिए एक कछुए की जरूरत हुई। उसने तीनों भाइयों को कछुआ लाने को कहा। वे तीनों समुद्र पर पहुँचे। वहाँ उन्हें एक कछुआ मिल गया। बड़े ने कहा, “मैं भोजनचंग हूँ, इसलिए कछुए को नहीं छुऊँगा।” मझला बोला, “मैं नारीचंग हूँ, मैं नहीं ले जाऊँगा।” सबसे छोटा बोल, “मैं शैयाचंग हूँ, सो मैं नहीं ले जाऊँगा।”
वे तीनों इस बहस में पड़ गये कि उनमें कौन बढ़कर है। जब वे आपस में इसका फैसला न कर सके तो राजा के पास पहुँचे। राजा ने कहा, “आप लोग रुकें। मैं तीनों की अलग-अलग जाँच करूँगा।”
इसके बाद राजा ने बढ़िया भोजन तैयार कराया और तीनों खाने बैठे। सबसे बड़े ने कहा, “मैं खाना नहीं खाऊँगा। इसमें मुर्दे की गन्ध आती है।” वह उठकर चला। राजा ने पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह भोजन श्मशान के पास के खेत का बना था। राजा ने कहा, “तुम सचमुच भोजनचंग हो, तुम्हें भोजन की पहचान है।”
रात के समय राजा ने एक सुन्दर स्त्री को मझले भाई के पास भेजा। ज्योंही वह वहाँ पहुँची कि मझले भाई ने कहा, “इसे हटाओ यहाँ से। इसके शरीर से बकरी का दूध की गंध आती है।”
राजा ने यह सुनकर पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह स्त्री बचपन में बकरी के दूध पर पली थी। राजा बड़ा खुश हुआ और बोला, “तुम सचमुच नारीचंग हो।”
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इसके बाद उसने तीसरे भाई को सोने के लिए सात गद्दों का पलंग दिया। जैसे ही वह उस पर लेटा कि एकदम चीखकर उठ बैठा। लोगों ने देखा, उसकी पीठ पर एक लाल रेखा खींची थी। राजा को ख़बर मिली तो उसने बिछौने को दिखवाया। सात गद्दों के नीचे उसमें एक बाल निकला। उसी से उसकी पीठ पर लाल लकीर हो गयी थीं।
राजा को बड़ा अचरज हुआ उसने तीनों को एक-एक लाख अशर्फियाँ दीं। अब वे तीनों कछुए को ले जाना भूल गये, वहीं आनन्द से रहने लगे।
इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजा! तुम बताओ, उन तीनों में से बढ़कर कौन था?”
राजा ने कहा, “मेरे विचार से सबसे बढ़कर शैयाचंग था, क्योंकि उसकी पीठ पर बाल का निशान दिखाई दिया और ढूँढ़ने पर बिस्तर में बाल पाया भी गया। बाकी दो के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि उन्होंने किसी से पूछकर जान लिया होगा।”
इतना सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा लौटकर वहाँ गया और उसे लेकर लौटा तो उसने यह कहानी कही।

सर्वश्रेष्ठ वर कौन – बेताल पच्चीसी – नवीं कहानी 

चम्मापुर नाम का एक नगर था, जिसमें चम्पकेश्वर नाम का राजा राज करता था। उसके सुलोचना नाम की रानी थी और त्रिभुवनसुन्दरी नाम की लड़की। राजकुमारी यथा नाम तथा गुण थी। जब वह बड़ी हुई तो उसका रूप और निखर गया। राजा और रानी को उसके विवाह की चिन्ता हुई। चारों ओर इसकी खबर फैल गयी। बहुत-से राजाओं ने अपनी-अपनी तस्वीरें बनवाकर भेंजी, पर राजकुमारी ने किसी को भी पसन्द न किया। राजा ने कहा, “बेटी, कहो तो स्वयम्वर करूँ?” लेकिन वह राजी नहीं हुई। आख़िर राजा ने तय किया कि वह उसका विवाह उस आदमी के साथ करेगा, जो रूप, बल और ज्ञान, इन तीनों में बढ़ा-चढ़ा होगा।
एक दिन राजा के पास चार देश के चार वर आये। एक ने कहा, “मैं एक कपड़ा बनाकर पाँच लाख में बेचता हूँ, एक लाख देवता को चढ़ाता हूँ, एक लाख अपने अंग लगाता हूँ, एक लाख स्त्री के लिए रखता हूँ और एक लाख से अपने खाने-पीने का ख़र्च चलाता हूँ। इस विद्या को और कोई नहीं जानता।”
दूसरा बोला, “मैं जल-थल के पशुओं की भाषा जानता हूँ।”
तीसरे ने कहा, “मैं इतना शास्त्र पढ़ा हूँ कि मेरा कोई मुकाबला नहीं कर सकता।”
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चौथे ने कहा, “मैं शब्दवेधी तीर चलाना जानता हूँ।”
चारों की बातें सुनकर राजा सोच में पड़ गया। वे सुन्दरता में भी एक-से-एक बढ़कर थे। उसने राजकुमारी को बुलाकर उनके गुण और रूप का वर्णन किया, पर वह चुप रही।
इतना कहकर बेताल बोला, “राजन्, तुम बताओ कि राजकुमारी किसको मिलनी चाहिए?”
राजा बोला, “जो कपड़ा बनाकर बेचता है, वह शूद्र है। जो पशुओं की भाषा जानता है, वह ज्ञानी है। जो शास्त्र पढ़ा है, ब्राह्मण है; पर जो शब्दवेधी तीर चलाना जानता है, वह राजकुमारी का सजातीय है और उसके योग्य है। राजकुमारी उसी को मिलनी चाहिए।”
राजा के इतना कहते ही बेताल गायब हो गया। राजा बेचारा वापस लौटा और उसे लेकर चला तो उसने दसवीं कहानी सुनायी।

सबसे अधिक त्यागी कौन?- बेताल पच्चीसी – दसवीं कहानी

मदनपुर नगर में वीरवर नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में एक वैश्य था, जिसका नाम हिरण्यदत्त था। उसके मदनसेना नाम की एक कन्या थी।
एक दिन मदनसेना अपनी सखियों के साथ बाग़ में गयी। वहाँ संयोग से सोमदत्त नामक सेठ का लड़का धर्मदत्त अपने मित्र के साथ आया हुआ था। वह मदनसेना को देखते ही उससे प्रेम करने लगा। घर लौटकर वह सारी रात उसके लिए बैचेन रहा। अगले दिन वह फिर बाग़ में गया। मदनसेना वहाँ अकेली बैठी थी। उसके पास जाकर उसने कहा, “तुम मुझसे प्यार नहीं करोगी तो मैं प्राण दे दूँगा।”
मदनसेना ने जवाब दिया, “आज से पाँचवे दिन मेरी शादी होनेवाली है। मैं तुम्हारी नहीं हो सकती।”
वह बोला, “मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता।”
मदनसेना डर गयी। बोली, “अच्छी बात है। मेरा ब्याह हो जाने दो। मैं अपने पति के पास जाने से पहले तुमसे ज़रूर मिलूँगी।”
वचन देके मदनसेना डर गयी। उसका विवाह हो गया और वह जब अपने पति के पास गयी तो उदास होकर बोली, “आप मुझ पर विश्वास करें और मुझे अभय दान दें तो एक बात कहूँ।” पति ने विश्वास दिलाया तो उसने सारी बात कह सुनायी। सुनकर पति ने सोचा कि यह बिना जाये मानेगी तो है नहीं, रोकना बेकार है। उसने जाने की आज्ञा दे दी।
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मदनसेना अच्छे-अच्छे कपड़े और गहने पहन कर चली। रास्ते में उसे एक चोर मिला। उसने उसका आँचल पकड़ लिया। मदनसेना ने कहा, “तुम मुझे छोड़ दो। मेरे गहने लेना चाहते हो तो लो।”
चोर बोला, “मैं तो तुम्हें चाहता हूँ।”
मदनसेना ने उसे सारा हाल कहा, “पहले मैं वहां हो आऊँ, तब तुम्हारे पास आऊँगी।”
चोर ने उसे छोड़ दिया।
मदनसेना धर्मदत्त के पास पहुँची। उसे देखकर वह बड़ा खुश हुआ और उसने पूछा, “तुम अपने पति से बचकर कैसे आयी हो?”
मदनसेना ने सारी बात सच-सच कह दी। धर्मदत्त पर उसका बड़ा गहरा असर पड़ा। उसने उसे छोड़ दिया। फिर वह चोर के पास आयी। चोर सब कुछ जानकर ब़ड़ा प्रभावित हुआ और वह उसे घर पर छोड़ गया। इस प्रकार मदनसेना सबसे बचकर पति के पास आ गयी। पति ने सारा हाल कह सुना तो बहुत प्रसन्न हुआ और उसके साथ आनन्द से रहने लगा।
इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजा! बताओ, पति, धर्मदत्त और चोर, इनमें से कौन अधिक त्यागी है?”
राजा ने कहा, “चोर। मदनसेना का पति तो उसे दूसरे आदमी पर रुझान होने से त्याग देता है। धर्मदत्त उसे इसलिए छोड़ता है कि उसका मन बदल गया था, फिर उसे यह डर भी रहा होगा कि कहीं उसका पति उसे राजा से कहकर दण्ड न दिलवा दे। लेकिन चोर का किसी को पता न था, फिर भी उसने उसे छोड़ दिया। इसलिए वह उन दोनों से अधिक त्यागी था।”
राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा जब उसे लेकर चला तो उसने यह कथा सुनायी।

सबसे अधिक सुकुमार कौन? – बेताल पच्चीसी ग्यारहवीं कहानी!!

गौड़ देश में वर्धमान नाम का एक नगर था, जिसमें गुणशेखर नाम का राजा राज करता था। उसके अभयचन्द्र नाम का दीवान था। उस दीवान के समझाने से राजा ने अपने राज्य में शिव और विष्णु की पूजा, गोदान, भूदान, पिण्डदान आदि सब बन्द कर दिये। नगर में डोंडी पिटवा दी कि जो कोई ये काम करेगा, उसका सबकुछ छीनकर उसे नगर से निकाल दिया जायेगा।
एक दिन दीवान ने कहा, “महाराज, अगर कोई किसी को दु:ख पहुँचाता है और उसके प्राण लेता है तो पाप से उसका जन्म-मरण नहीं छूटता। वह बार-बार जन्म लेता और मरता है। इससे मनुष्य का जन्म पाकर धर्म बढ़ाना चाहिए। आदमी को हाथी से लेकर चींटी तक सबकी रक्षा करनी चाहिए। जो लोग दूसरों के दु:ख को नहीं समझते और उन्हें सताते हैं, उनकी इस पृथ्वी पर उम्र घटती जाती है और वे लूले-लँगड़े, काने, बौने होकर जन्म लेते हैं।”
राजा ने कहा “ठीक है।” अब दीवान जैसे कहता, राजा वैसे ही करता। दैवयोग से एक दिन राजा मर गया। उसकी जगह उसका बेटा धर्मराज गद्दी पर बैठा। एक दिन उसने किसी बात पर नाराज होकर दीवान को नगर से बाहर निकलवा दिया।
कुछ दिन बाद, एक बार वसन्त ऋतु में वह इन्दुलेखा, तारावली और मृगांकवती, इन तीनों रानियों को लेकर बाग़ में गया। वहाँ जब उसने इन्दुलेखा के बाल पकड़े तो उसके कान में लगा हुआ कमल उसकी जाँघ पर गिर गया। कमल के गिरते ही उसकी जाँघ में घाव हो गया और वह बेहोश हो गयी। बहुत इलाज हुआ, तब वह ठीक हुई। इसके बाद एक दिन की बात कि तारावली ऊपर खुले में सो रही थी। चांद निकला। जैसे ही उसकी चाँदनी तारावली के शरीर पर पड़ी, फफोले उठ आये। कई दिन के इलाज के बाद उसे आराम हुआ। इसके बाद एक दिन किसी के घर में मूसलों से धान कूटने की आवाज हुई। सुनते ही मृगांकवती के हाथों में छाले पड़ गये। इलाज हुआ, तब जाकर ठीक हुए।
इतनी कथा सुनाकर बेताल ने पूछा, “महाराज, बताइए, उन तीनों में सबसे ज्यादा कोमल कौन थी?”
राजा ने कहा, “मृगांकवती, क्योंकि पहली दो के घाव और छाले कमल और चाँदनी के छूने से हुए थे। तीसरी ने मूसल को छुआ भी नहीं और छाले पड़ गये। वही सबसे अधिक सुकुमार हुई।”
राजा के इतना कहते ही बेताल नौ-दो ग्यारह हो गया। राजा बेचारा फिर मसान में गया और जब वह उसे लेकर चला तो उसने एक और कहानी सुनायी।

दीवान की मृत्यु क्यूँ ? – बेताल पच्चीसी – बारहवीं कहानी|

किसी ज़माने में अंगदेश मे यशकेतु नाम का राजा था। उसके दीर्घदर्शी नाम का बड़ा ही चतुर दीवान था। राजा बड़ा विलासी था। राज्य का सारा बोझ दीवान पर डालकर वह भोग में पड़ गया। दीवान को बहुत दु:ख हुआ। उसने देखा कि राजा के साथ सब जगह उसकी निन्दा होती है। इसलिए वह तीरथ का बहाना करके चल पड़ा। चलते-चलते रास्ते में उसे एक शिव-मन्दिर मिला। उसी समय निछिदत्त नाम का एक सौदागर वहाँ आया और दीवान के पूछने पर उसने बताया कि वह सुवर्णद्वीप में व्यापार करने जा रहा है। दीवान भी उसके साथ हो लिया।
दोनों जहाज़ पर चढ़कर सुवर्णद्वीप पहुँचे और वहाँ व्यापार करके धन कमाकर लौटे। रास्ते में समुद्र में एक दीवान को एक कृल्पवृक्ष दिखाई दिया। उसकी मोटी-मोटी शाखाओं पर रत्नों से जुड़ा एक पलंग बिछा था। उस पर एक रूपवती कन्या बैठी वीणा बजा रही थी। थोड़ी देर बाद वह ग़ायब हो गयी। पेड़ भी नहीं रहा। दीवान बड़ा चकित हुआ।
दीवान ने अपने नगर में लौटकर सारा हाल कह सुनाया। इस बीच इतने दिनों तक राज्य को चला कर राजा सुधर गया था और उसने विलासिता छोड़ दी थी। दीवान की कहानी सुनकर राजा उस सुन्दरी को पाने के लिए बेचैन हो उठा और राज्य का सारा काम दीवान पर सौंपकर तपस्वी का भेष बनाकर वहीं पहुँचा। पहुँचने पर उसे वही कल्पवृक्ष और वीणा बजाती कन्या दिखाई दी। उसने राजा से पूछा, “तुम कौन हो?” राजा ने अपना परिचय दे दिया। कन्या बोली, “मैं राजा मृगांकसेन की कन्या हूँ। मृगांकवती मेरा नाम है। मेरे पिता मुझे छोड़कर न जाने कहाँ चले गये।”
राजा ने उसके साथ विवाह कर लिया। कन्या ने यह शर्त रखी कि वह हर महीने के शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की चतुर्दशी और अष्टमी को कहीं जाया करेगी और राजा उसे रोकेगा नहीं। राजा ने यह शर्त मान ली।
इसके बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी आयी तो राजा से पूछकर मृगांकवती वहाँ से चली। राजा भी चुपचाप पीछे-पीछे चल दिया। अचानक राजा ने देखा कि एक राक्षस निकला और उसने मृगांकवती को निगल लिया। राजा को बड़ा गुस्सा आया और उसने राक्षस का सिर काट डाला। मृगांकवती उसके पेट से जीवित निकल आयी।
राजा ने उससे पूछा कि यह क्या माजरा है तो उसने कहा, “महाराज, मेरे पिता मेरे बिना भोजन नहीं करते थे। मैं अष्टमी और चतुदर्शी के दिन शिव पूजा यहाँ करने आती थी। एक दिन पूजा में मुझे बहुत देर हो गयी। पिता को भूखा रहना पड़ा। देर से जब मैं घर लौटी तो उन्होंने गुस्से में मुझे शाप दे दिया कि अष्टमी और चतुर्दशी के दिन जब मैं पूजन के लिए आया करूँगी तो एक राक्षस मुझे निगल जाया करेगा और मैं उसका पेट चीरकर निकला करूँगी। जब मैंने उनसे शाप छुड़ाने के लिए बहुत अनुनय की तो वह बोले, “जब अंगदेश का राजा तेरा पति बनेगा और तुझे राक्षस से निगली जाते देखेगा तो वह राक्षस को मार देगा। तब तेरे शाप का अन्त होगा।”
इसके बाद राजा उसे लेकर नगर में आया। दीवान ने यह देखा तो उसका हृदय फट गया। और वह मर गया।
इतना कहकर बेताल ने पूछा, “हे राजन्! यह बताओ कि स्वामी की इतनी खुशी के समय दीवान का हृदय फट गया?”
राजा ने कहा, “इसलिए कि उसने सोचा कि राजा फिर स्त्री के चक्कर में पड़ गया और राज्य की दुर्दशा होगी।”
राजा का इतना कहना था कि बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा ने वहाँ जाकर फिर उसे साथ लिया तो रास्ते में बेताल ने यह कहानी सुनायी।

क्या चोरी की गयी चीज़ पर चोर का अधिकार होता है: बेताल पच्चीसी पन्द्रहवीं कहानी

नेपाल देश में शिवपुरी नामक नगर मे यशकेतु नामक राजा राज करता था। उसके चन्द्रप्रभा नाम की रानी और शशिप्रभा नाम की लड़की थी।
जब राजकुमारी बड़ी हुई तो एक दिन वसन्त उत्सव देखने बाग़ में गयी। वहाँ एक ब्राह्मण का लड़का आया हुआ था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और प्रेम करने लगे। इसी बीच एक पागल हाथी वहाँ दौड़ता हुआ आया। ब्राह्मण का लड़का राजकुमारी को उठाकर दूर ले गया और हाथी से बचा दिया। शशिप्रभा महल में चली गयी; पर ब्राह्मण के लड़के के लिए व्याकुल रहने लगी।
उधर ब्राह्मण के लड़के की भी बुरी दशा थी। वह एक सिद्धगुरू के पास पहुँचा और अपनी इच्छा बतायी। उसने एक योग-गुटिका अपने मुँह में रखकर ब्राह्मण का रूप बना लिया और एक गुटिका ब्राह्मण के लड़के के मुँह में रखकर उसे सुन्दर लड़की बना दिया। राजा के पास जाकर कहा, “मेरा एक ही बेटा है। उसके लिए मैं इस लड़की को लाया था; पर लड़का न जाने कहाँ चला गया। आप इसे यहाँ रख ले। मैं लड़के को ढूँढ़ने जाता हूँ। मिल जाने पर इसे ले जाऊँगा।”
सिद्धगुरु चला गया और लड़की के भेस में ब्राह्मण का लड़का राजकुमार के पास रहने लगा। धीरे-धीरे दोनों में बड़ा प्रेम हो गया। एक दिन राजकुमारी ने कहा, “मेरा दिल बड़ा दुखी रहता है। एक ब्राह्मण के लड़के ने पागल हाथी से मरे प्राण बचाये थे। मेरा मन उसी में रमा है।”
इतना सुनकर उसने गुटिका मुँह से निकाल ली और ब्राह्मण-कुमार बन गया। राजकुमार उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुई। तबसे वह रात को रोज़ गुटिका निकालकर लड़का बन जाता, दिन में लड़की बना रहता। दोनों ने चुपचाप विवाह कर लिया।
कुछ दिन बाद राजा के साले की कन्या मृगांकदत्ता का विवाह दीवान के बेटे के साथ होना तय हुआ। राजकुमारी अपने कन्या-रूपधार ब्राह्मणकुमार के साथ वहाँ गयी। संयोग से दीवान का पुत्र उस बनावटी कन्या पर रीझ गया। विवाह होने पर वह मृगांकदत्ता को घर तो ले गया; लेकिन उसका हृदय उस कन्या के लिए व्याकुल रहने लगा उसकी यह दशा देखकर दीवान बहुत हैरान हुआ। उसने राजा को समाचार भेजा। राजा आया। उसके सामने सवाल थ कि धरोहर के रूप में रखी हुई कन्या को वह कैसे दे दे? दूसरी ओर यह मुश्किल कि न दे तो दीवान का लड़का मर जाये।
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बहुत सोच-विचार के बाद राजा ने दोनों का विवाह कर दिया। बनावटी कन्या ने यह शर्त रखी कि चूँकि वह दूसरे के लिए लायी गयी थी, इसलिए उसका यह पति छ: महीने तक यात्रा करेगा, तब वह उससे बात करेगी। दीवान के लड़के ने यह शर्त मान ली।
विवाह के बाद वह उसे मृगांकदत्ता के पास छोड़ तीर्थ-यात्रा चला गया। उसके जाने पर दोनों आनन्द से रहने लगे। ब्राह्मणकुमार रात में आदमी बन जाता और दिन में कन्या बना रहता।
जब छ: महीने बीतने को आये तो वह एक दिन मृगांकदत्ता को लेकर भाग गया।
उधर सिद्धगुरु एक दिन अपने मित्र शशि को युवा पुत्र बनाकर राजा के पास लाया और उस कन्या को माँगा। शाप के डर के मारे राजा ने कहा, “वह कन्या तो जाने कहाँ चली गयी। आप मेरी कन्या से इसका विवाह कर दें।”
वह राजी हो गया और राजकुमारी का विवाह शशि के साथ कर दिया। घर आने पर ब्राह्मणकुमार ने कहा, “यह राजकुमारी मेरी स्त्री है। मैंने इससे गंधर्व-रीति से विवाह किया है।”
शशि ने कहा, “यह मेरी स्त्री है, क्योंकि मैंने सबके सामने विधि-पूर्वक ब्याह किया है।”
बेताल ने पूछा, “शशि दोनों में से किस की पत्नी है?”
राजा ने कहा, “मेरी राय में वह शशि की पत्नी है, क्योंकि राजा ने सबके सामने विधिपूर्वक विवाह किया था। ब्राह्मणकुमार ने तो चोरी से ब्याह किया था। चोरी की चीज़ पर चोर का अधिकार नहीं होता।”
इतना सुनना था कि बेताल गायब हो गया और राजा को जाकर फिर उसे लाना पड़ा। रास्ते में बेताल ने फिर एक कहानी सुनायी।

सबसे बड़ा काम किसने किया? – बेताल पच्चीसी सोलहवीं कहानी

हिमाचल पर्वत पर गंधर्वों का एक नगर था, जिसमें जीमूतकेतु नामक राजा राज करता था। उसके एक लड़का था, जिसका नाम जीमूतवाहन था। बाप-बेटे दोनों भले थे। धर्म-कर्म मे लगे रहते थे। इससे प्रजा के लोग बहुत स्वच्छन्द हो गये और एक दिन उन्होंने राजा के महल को घेर लिया। राजकुमार ने यह देखा तो पिता से कहा कि आप चिन्ता न करें। मैं सबको मार भगाऊँगा। राजा बोला, “नहीं, ऐसा मत करो। युधिष्ठिर भी महाभारत करके पछताये थे।”
इसके बाद राजा अपने गोत्र के लोगों को राज्य सौंप राजकुमार के साथ मलयाचल पर जाकर मढ़ी बनाकर रहने लगा। वहाँ जीमूतवाहन की एक ऋषि के बेटे से दोस्ती हो गयी। एक दिन दोनों पर्वत पर भवानी के मन्दिर में गये तो दैवयोग से उन्हें मलयकेतु राजा की पुत्री मिली। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गये। जब कन्या के पिता को मालूम हुआ तो उसने अपनी बेटी उसे ब्याह दी।
एक रोज़ की बात है कि जीमूतवाहन को पहाड़ पर एक सफ़ेद ढेर दिखाई दिया। पूछा तो मालूम हुआ कि पाताल से बहुत-से नाग आते हैं, जिन्हें गरुड़ खा लेता है। यह ढेर उन्हीं की हड्डियों का है। उसे देखकर जीमूतवाहन आगे बढ़ गया। कुछ दूर जाने पर उसे किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। पास गया तो देखा कि एक बुढ़िया रो रही है। कारण पूछा तो उसने बताया कि आज उसके बेटे शंखचूड़ नाग की बारी है। उसे गरुड़ आकर खा जायेगा। जीमूतवाहन ने कहा, “माँ, तुम चिन्ता न करो, मैं उसकी जगह चला जाऊँगा।” बुढ़िया ने बहुत समझाया, पर वह न माना।
इसके बाद गरुड़ आया और उसे चोंच में पकड़कर उड़ा ले गया। संयोग से राजकुमार का बाजूबंद गिर पड़ा, जिस पर राजा का नाम खुदा था। उस पर खून लगा था। राजकुमारी ने उसे देखा। वह मूर्च्छित हो गयी। होश आने पर उसने राजा और रानी को सब हाल सुनाया। वे बड़े दु:खी हुए और जीमूतवाहन को खोजने निकले। तभी उन्हें शंखचूड़ मिला। उसने गरुड़ को पुकार कर कहा, “हे गरुड़! तू इसे छोड़ दे। बारी तो मेरी थी।”
गरुड़ ने राजकुमार से पूछा, “तू अपनी जान क्यों दे रहा है?” उसने कहा, “उत्तम पुरुष को हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए।”
यह सुनकर गरुड़ बहुत खुश हुआ उसने राजकुमार से वर माँगने को कहा। जीमूतवाहन ने अनुरोध किया कि सब साँपों को जिला दो। गरुड़ ने ऐसा ही किया। फिर उसने कहा, “तुझे अपना राज्य भी मिल जायेगा।”
इसके बाद वे लोग अपने नगर को लौट आये। लोगों ने राजा को फिर गद्दी पर बिठा दिया। इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजन् यह बताओ, इसमें सबसे बड़ा काम किसने किया?”
राजा ने कहा “शंखचूड़ ने?”
बेताल ने पूछा, “कैसे?”
राजा बोला, “जीमूतवाहन जाति का क्षत्री था। प्राण देने का उसे अभ्यास था। लेकिन बड़ा काम तो शंखचूड़ ने किया, जो अभ्यास न होते हुए भी जीमूतवाहन को बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हो गया।”
इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे लाया तो उसने फिर एक कहानी सुनायी।

अधिक साहसी कौन : बेताल पच्चीसी – सत्रहवीं कहानी!!

चन्द्रशेखर नगर में रत्नदत्त नाम का एक सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी। उसका नाम था उन्मादिनी। जब वह बड़ी हुई तो रत्नदत्त ने राजा के पास जाकर कहा कि आप चाहें तो उससे ब्याह कर लीजिए। राजा ने तीन दासियों को लड़की को देख आने को कहा। उन्होंने उन्मादिनी को देखा तो उसके रुप पर मुग्ध हो गयीं, लेकिन उन्होंने यह सोचकर कि राजा उसके वश में हो जायेगा, आकर कह दिया कि वह तो कुलक्षिणी है राजा ने सेठ से इन्कार कर दिया।
इसके बाद सेठ ने राजा के सेनापति बलभद्र से उसका विवाह कर दिया। वे दोनों अच्छी तरह से रहने लगे।
एक दिन राजा की सवारी उस रास्ते से निकली। उस समय उन्मादिनी अपने कोठे पर खड़ी थी। राजा की उस पर निगाह पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने पता लगाया। मालूम हुआ कि वह सेठ की लड़की है। राजा ने सोचा कि हो-न-हो, जिन दासियों को मैंने देखने भेजा था, उन्होंने छल किया है। राजा ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने आकर सारी बात सच-सच कह दी। इतने में सेनापति वहाँ आ गया। उसे राजा की बैचेनी मालूम हुई। उसने कहा, “स्वामी उन्मादिनी को आप ले लीजिए।” राजा ने गुस्सा होकर कहा, “क्या मैं अधर्मी हूँ, जो पराई स्त्री को ले लूँ?”
राजा को इतनी व्याकुलता हुई कि वह कुछ दिन में मर गया। सेनापति ने अपने गुरु को सब हाल सुनाकर पूछा कि अब मैं क्या करूँ? गुरु ने कहा, “सेवक का धर्म है कि स्वामी के लिए जान दे दे।”
राजा की चिता तैयार हुई। सेनापति वहाँ गया और उसमें कूद पड़ा। जब उन्मादिनी को यह बात मालूम हुई तो वह पति के साथ जल जाना धर्म समझकर चिता के पास पहुँची और उसमें जाकर भस्म हो गयी।
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इतना कहकर बेताल ने पूछा, “राजन्, बताओ, सेनापति और राजा में कौन अधिक साहसी था?”
राजा ने कहा, “राजा अधिक साहसी था; क्योंकि उसने राजधर्म पर दृढ़ रहने के लिए उन्मादिनी को उसके पति के कहने पर भी स्वीकार नहीं किया और अपने प्राणों को त्याग दिया। सेनापति कुलीन सेवक था। अपने स्वामी की भलाई में उसका प्राण देना अचरज की बात नहीं। असली काम तो राजा ने किया कि प्राण छोड़कर भी राजधर्म नहीं छोड़ा।”
राजा का यह उत्तर सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे पुन: पकड़कर लाया और तब उसने यह कहानी सुनायी।

बालक क्यों हँसा? बेताल पच्चीसी – बीसवीं कहानी!

चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था। एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गया। घूमते-घूमते वह रास्ता भूल गया और अकेला रह गया। थक कर वह एक पेड़ की छाया में लेटा कि उसे एक ऋषि-कन्या दिखाई दी। उसे देखकर राजा उस पर मोहित हो गया। थोड़ी देर में ऋषि स्वयं आ गये। ऋषि ने पूछा, “तुम यहाँ कैसे आये हो?” राजा ने कहा, “मैं शिकार खेलने आया हूँ। ऋषि बोले, “बेटा, तुम क्यों जीवों को मारकर पाप कमाते हो?”

राजा ने वादा किया कि मैं अब कभी शिकार नहीं खेलूँगा। खुश होकर ऋषि ने कहा, “तुम्हें जो माँगना हो, माँग लो।”
राजा ने ऋषि-कन्या माँगी और ऋषि ने खुश होकर दोनों का विवाह कर दिया। राजा जब उसे लेकर चला तो रास्ते में एक भयंकर राक्षस मिला। बोला, “मैं तुम्हारी रानी को खाऊँगा। अगर चाहते हो कि वह बच जाय तो सात दिन के भीतर एक ऐसे ब्राह्मण-पुत्र का बलिदान करो, जो अपनी इच्छा से अपने को दे और उसके माता-पिता उसे मारते समय उसके हाथ-पैर पकड़ें।” डर के मारे राजा ने उसकी बात मान ली। वह अपने नगर को लौटा और अपने दीवान को सब हाल कह सुनाया। दीवान ने कहा, “आप परेशान न हों, मैं उपाय करता हूँ।”
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इसके बाद दीवान ने सात बरस के बालक की सोने की मूर्ति बनवायी और उसे कीमती गहने पहनाकर नगर-नगर और गाँव-गाँव घुमवाया। यह कहलवा दिया कि जो कोई सात बरस का ब्राह्मण का बालक अपने को बलिदान के लिए देगा और बलिदान के समय उसके माँ-बाप उसके हाथ-पैर पकड़ेंगे, उसी को यह मूर्ति और सौ गाँव मिलेंगे।
यह ख़बर सुनकर एक ब्राह्मण-बालक राजी हो गया, उसने माँ-बाप से कहा, “आपको बहुत-से पुत्र मिल जायेंगे। मेरे शरीर से राजा की भलाई होगी और आपकी गरीबी मिट जायेगी।”
माँ-बाप ने मना किया, पर बालक ने हठ करके उन्हें राजी कर लिया।
माँ-बाप बालक को लेकर राजा के पास गये। राजा उन्हें लेकर राक्षस के पास गया। राक्षस के सामने माँ-बाप ने बालक के हाथ-पैर पकड़े और राजा उसे तलवार से मारने को हुआ। उसी समय बालक बड़े ज़ोर से हँस पड़ा।
इतना कहकर बेताल बोला, “हे राजन्, यह बताओ कि वह बालक क्यों हँसा?”
राजा ने फौरन उत्तर दिया, “इसलिए कि डर के समय हर आदमी रक्षा के लिए अपने माँ-बाप को पुकारता है। माता-पिता न हों तो पीड़ितों की मदद राजा करता है। राजा न कर सके तो आदमी देवता को याद करता है। पर यहाँ तो कोई भी बालक के साथ न था। माँ-बाप हाथ पकड़े हुए थे, राजा तलवार लिये खड़ा था और राक्षस भक्षक हो रहा था। ब्राह्मण का लड़का परोपकार के लिए अपना शरीर दे रहा था। इसी हर्ष से और अचरज से वह हँसा।”
इतना सुनकर बेताल अन्तर्धान हो गया और राजा लौटकर फिर उसे ले आया। रास्ते में बेताल ने फिर कहानी शुरू कर दी।

शेर बनाने का अपराध किसने किया? बेताल पच्चीसी – बाईसवीं कहानी!!

कुसुमपुरनगरमेंएकराजाराज्यकरताथा।उसकेनगरमेंएकब्राह्मणथाजिसकेचारबेटेथे।लड़कोंकेसयानेहोनेपरब्राह्मणमरगयाऔरब्राह्मणीउसकेसाथसतीहोगयी।उनकेरिश्तेदारोंनेउनकाधनछीनलिया।वेचारोंभाईनानाकेयहाँचलेगये।लेकिनकुछदिनबादवहाँभीउनकेसाथबुराव्यवहारहोनेलगा।तबसबनेमिलकरसोचाकिकोईविद्यासीखनीचाहिए।यहसोचकरकेचारोंचारदिशाओंमेंचलदिये।
कुछसमयबादवेविद्यासीखकरमिले।एकनेकहा, “मैंनेऐसीविद्यासीखीहैकिमैंमरेहुएप्राणीकीहड्डियोंपरमांसचढ़ासकताहूँ।” दूसरेनेकहा, “मैंउसकेखालऔरबालपैदाकरसकताहूँ।” तीसरेनेकहा, “मैंउसकेसारेअंगबनासकताहूँ।” चौथाबोला, “मैंउसमेंजानडालसकताहूँ।
फिरवेअपनीविद्याकीपरीक्षालेनेजंगलमेंगये।वहाँउन्हेंएकमरेशेरकीहड्डियाँमिलीं।उन्होंनेउसेबिनापहचानेहीउठालिया।एकनेमाँसडालादूसरेनेखालऔरबालपैदाकियेतीसरेनेसारेअंगबनायेऔरचौथेनेउसमेंप्राणडालदिये।शेरजीवितहोउठाऔरसबकोखागया।
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यहकथासुनाकरबेतालबोला, “हेराजाबताओकिउनचारोंमेंशेरबनानेकाअपराधकिसनेकिया?”
राजानेकहा, “जिसनेप्राणडालेउसनेक्योंकिबाकीतीनकोयहपताहीनहींथाकिवेशेरबनारहेहैं।इसलिएउनकाकोईदोषनहींहै।
यहसुनकरबेतालफिरपेड़परजालटका।राजाजाकरफिरउसेलाया।रास्तेमेंबेतालनेएकनयीकहानीसुनायी।

योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा? बेताल पच्चीसी – तेईसवीं कहानी!

कलिंग देश में शोभावती नाम का एक नगर है। उसमें राजा प्रद्युम्न राज करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसके देवसोम नाम का बड़ा ही योग्य पुत्र था। जब देवसोम सोलह बरस का हुआ और सारी विद्याएँ सीख चुका तो एक दिन दुर्भाग्य से वह मर गया। बूढ़े माँ-बाप बड़े दु:खी हुए। चारों ओर शोक छा गया। जब लोग उसे लेकर श्मशान में पहुँचे तो रोने-पीटने की आवाज़ सुनकर एक योगी अपनी कुटिया में से निकलकर आया। पहले तो वह खूब ज़ोर से रोया, फिर खूब हँसा, फिर योग-बल से अपना शरीर छोड़ कर उस लड़के के शरीर में घुस गया। लड़का उठ खड़ा हुआ। उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए।
वह लड़का वही तपस्या करने लगा।
इतना कहकर बेताल बोला, “राजन्, यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा?”
राजा ने कहा, “इसमें क्या बात है! वह रोया इसलिए कि जिस शरीर को उसके माँ-बाप ने पाला-पोसा और जिससे उसने बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त कीं, उसे छोड़ रहा था। हँसा इसलिए कि वह नये शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकेगा।”
राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर उसे लाया तो रास्ते में बेताल ने कहा, “हे राजन्, मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि बिना जरा-सा भी हैरान हुए तुम मेरे सवालों का जवाब देते रहे हो और बार-बार आने-जाने की परेशानी उठाते रहे हो। आज मैं तुमसे एक बहुत भारी सवाल करूँगा। सोचकर उत्तर देना।”
इसके बाद बेताल ने यह कहानी सुनायी।

माँ-बेटी के बच्चों में क्या रिश्ता हुआ? बेताल पच्चीसी – चौबीसवीं कहानी!

किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज करता था। उसकी पत्नी का नाम चडवती था। वह मालव देश के राजा की लड़की थी। उसके लावण्यवती नाम की एक कन्या थी। जब वह विवाह के योग्य हुई तो राजा के भाई-बन्धुओं ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश-निकाला दे दिया। राजा रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया। रात को वे एक वन में ठहरे। पहले दिन चलकर भीलों की नगरी में पहुँचे। राजा ने रानी और बेटी से कहा कि तुम लोग वन में छिप जाओ, नहीं तो भील तुम्हें परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गयीं। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला किया। राजा ने मुकाबला किया, पर अन्त में वह मारा गया। भील चले गये।
उसके जाने पर रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयीं और राजा को मरा देखकर बड़ी दु:खी हुईं। वे दोनों शोक करती हुईं एक तालाब के किनारे पहुँची। उसी समय वहाँ चंडसिंह नाम का साहूकार अपने लड़के के साथ, घोड़े पर चढ़कर, शिकार खेलने के लिए उधर आया। दो स्त्रियों के पैरों के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला, “अगर ये स्त्रियाँ मिल जों तो जायें जिससे चाहो, विवाह कर लेना।”
लड़के ने कहा, “छोटे पैर वाली छोटी उम्र की होगी, उससे मैं विवाह कर लूँगा। आप बड़ी से कर लें।”
साहूकार विवाह नहीं करना चाहता था, पर बेटे के बहुत कहने पर राजी हो गया।
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थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें दोनों स्त्रियां दिखाई दीं। साहूकार ने पूछा, “तुम कौन हो?”
रानी ने सारा हाल कह सुनाया। साहूकार उन्हें अपने घर ले गया। संयोग से रानी के पैर छोटे थे, पुत्री के पैर बड़े। इसलिए साहूकार ने पुत्री से विवाह किया, लड़के ने रानी से हुई और इस तरह पुत्री सास बनी और माँ बेटे की बहू। उन दोनों के आगे चलकर कई सन्तानें हुईं।
इतना कहकर बेताल बोला, “राजन्! बताइए, माँ-बेटी के जो बच्चे हुए, उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ?”
यह सवाल सुनकर राजा बड़े चक्कर में पड़ा। उसने बहुत सोचा, पर जवाब न सूझ पड़ा। इसलिए वह चुपचाप चलता रहा।
बेताल यह देखकर बोला, “राजन्, कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे धीरज और पराक्रम से खुश हूँ। मैं अब इस मुर्दे से निकला जाता हूँ। तुम इसे योगी के पास ले जाओ। जब वह तुम्हें इस मुर्दे को सिर झुकाकर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना कि पहले आप करके दिखाओ। जब वह सिर झुकाकर बतावे तो तुम उसका सिर काट लेना। उसका बलिदान करके तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे। सिर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा।”
इतना कहकर बेताल चला गया और राजा मुर्दे को लेकर योगी के पास आया

बेताल पच्चीसी – पच्चीसवीं कहानी!!

योगी राजा को और मुर्दे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। बोला, “हे राजन्! तुमने यह कठिन काम करके मेरे साथ बड़ा उपकार किया है। तुम सचमुच सारे राजाओं में श्रेष्ठ हो।”
इतना कहकर उसने मुर्दे को उसके कंधे से उतार लिया और उसे स्नान कराकर फूलों की मालाओं से सजाकर रख दिया। फिर मंत्र-बल से बेताल का आवाहन करके उसकी पूजा की। पूजा के बाद उसने राजा से कहा, “हे राजन्! तुम शीश झुकाकर इसे प्रणाम करो।”
राजा को बेताल की बात याद आ गयी। उसने कहा, “मैं राजा हूँ, मैंने कभी किसी को सिर नहीं झुकाया। आप पहले सिर झुकाकर बता दीजिए।”
योगी ने जैसे ही सिर झुकाया, राजा ने तलवार से उसका सिर काट दिया। बेताल बड़ा खुश हुआ। बोला, “राजन्, यह योगी विद्याधरों का स्वामी बनना चाहता था। अब तुम बनोगे। मैंने तुम्हें बहुत हैरान किया है। तुम जो चाहो सो माँग लो।”
राजा ने कहा, “अगर आप मुझसे खुश हैं तो मेरी प्रार्थना है कि आपने जो चौबीस कहानियाँ सुनायीं, वे, और पच्चीसवीं यह, सारे संसार में प्रसिद्ध हो जायें और लोग इन्हें आदर से पढ़े।”
बेताल ने कहा, “ऐसा ही होगा। ये कथाएँ ‘बेताल-पच्चीसी’ के नाम से मशहूर होंगी और जो इन्हें पढ़ेंगे, उनके पाप दूर हो जायेंगे।”
यह कहकर बेताल चला गया। उसके जाने के बाद शिवजी ने प्रकट होकर कहा, “राजन्, तुमने अच्छा किया, जो इस दुष्ट साधु को मार डाला। अब तुम जल्दी ही सातों द्वीपों और पाताल-सहित सारी पृथ्वी पर राज्य स्थापित करोगे।”
इसके बाद शिवजी अन्तर्धान हो गये। काम पूरे करके राजा श्मशान से नगर में आ गया। कुछ ही दिनों में वह सारी पृथ्वी का राजा बन गया और बहुत समय तक आनन्द से राज्य करते हुए अन्त में भगवान में समा गया।

कोरोनावायरस: पीएम मोदी शाम 8 बजे देश को संबोधित करेंगे

narendra modi ji PM Modi to address the country

कोरोना वायरस का प्रकोप पूरे भारत में फैल रहा है। चीन से शुरू होकर अब यह दुनिया के विभिन्न देशों में फैल गया है। भारत भी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गया है। कोरोना वायरस को रोकने के लिए कई तरह की तिथियों का उपयोग किया जाता है। कोरोना वायरस से निपटने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रात 8 बजे देश को संबोधित करेंगे।

कोरोना वायरस का प्रकोप पूरे भारत में फैल रहा है। चीन से शुरू होकर अब यह दुनिया के विभिन्न देशों में फैल गया है। भारत भी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गया है। कोरोना वायरस को रोकने के लिए विभिन्न तिथियों का उपयोग किया जाता है। कोरोना वायरस से निपटने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रात 8 बजे देश को संबोधित करेंगे।

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भारत में कोरोना वायरस के अब तक 168 मामले सामने आए हैं। इन रोगियों में से 126 भारतीय रोगी हैं जिन्हें अलग-थलग रखा गया है। भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित विदेशी मरीजों की संख्या 25 है। इनके अलावा, ऐसे मरीज हैं जो कोरोना वायरस से लड़कर लौटे हैं। उनकी संख्या 14 बताई जाती है। भारत में कोरोना वायरस से तीन लोगों की मौत हो गई है। कोरोना वायरस से निपटने के लिए भारत के हर शहर में विशेष आइसोलेट वार्ड स्थापित किए गए हैं। चिकित्सा सुविधा के लिए विशेष हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं।

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Coronavirus: PM Modi to address the country at 8 pm

निर्भया गैंगरेप के आरोपियों ने कहा, “अगर हम फांसी लगा लेंगे तो गैंगरेप रुक जाएगा”

निर्भया गैंगरेप के आरोपियों ने कहा, "अगर हम फांसी लगा लेंगे तो गैंगरेप रुक जाएगा"

निर्भया गैंगरेप और हत्या के मामले के अपराधी हर सांस में आखिरी सांस तक रहे हैं। गौरतलब है कि 20 मार्च को तिहाड़ जेल में फांसी की तैयारी पूरी हो चुकी है।

निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस में आरोपी अपनी फांसी से एक दिन पहले तक हर पैंतरा अपनाने से बाज नहीं आते। आरोपी मौत की सजा को रोकने के लिए फिर से अदालत पहुंचा है। वे हर समय कह रहे हैं कि उन्हें फांसी देने से कुछ भी नहीं बदलता है। हिंदी अखबार न्यू इंडिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फैसले के चार आरोपियों में से एक विनय ने दिल्ली तिहाड़ जेल के एक अधिकारी से कहा कि अगर उसे रोकने के लिए रैंप बंद कर दिया गया तो उसे फांसी दे दी जाएगी।

 

रिपोर्ट के अनुसार, विनय ने कहा: “अगर हमें फांसी दी जाती है, तो देश में बलात्कार बंद हो जाएंगे, तो निश्चित रूप से हमें फांसी दी जाएगी। लेकिन ये बलात्कार रुकने वाले नहीं हैं।” रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारी ने यह भी कहा कि मुकेश को छोड़कर किसी को भी आरोपी का चेहरा देखकर नहीं लगता कि 1 दिन बाद 20 मार्च को फांसी दी गई थी।

अक्षय के घर पर अभी तक नहीं आया है

बता दें कि चारों आरोपी अक्षय, पवन, विनय और मुकेश को 20 मार्च की सुबह फांसी दी जाएगी। तिहाड़ जेल प्रशासन ने इसके लिए पूरी तैयारी कर ली है। अभियुक्त, विशेष रूप से पवन जलद को उसकी फांसी के लिए मेरठ जेल में तिहाड़ बुलाया गया था, जिसे वह मंगलवार शाम को तिहाड़ आया है। यहां उन्होंने 18 मार्च की सुबह, 18 मार्च की सुबह खुद को चार तारीखों को फांसी पर लटका लिया। यह जानकारी तिहाड़ जेल के अधिकारी ने न्यूज एजेंसी एनआई को दी है।

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक अक्षय के परिवार ने चार आरोपियों में से उनसे मुलाकात भी नहीं की है। अगर गुरुवार के अक्षय का परिवार आज यात्रा करने के लिए आता है, तो उन्हें जाने की अनुमति दी जाएगी। इसके अलावा, गुरुवार को दोपहर 12 बजे तक एक नई अदालत की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा। मुकेश, विनय के परिवार ने उनसे मुलाकात की है।

Nirbhaya gangrape accused said, “If the gangrape will stop if we hank, hang on”

 

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nirbhaya gaingarep aur mardar kes mein aaropee apanee phaansee se ek din pahale tak har paintara apanaane se baaj nahin aate. aaropee maut kee saja ko rokane ke lie phir se adaalat pahuncha hai. ve har samay kah rahe hain ki unhen phaansee dene se kuchh bhee nahin badalata hai. hindee akhabaar nyoo indiya taims kee ek riport ke mutaabik, phaisale ke chaar aaropiyon mein se ek vinay ne dillee tihaad jel ke ek adhikaaree se kaha ki agar use rokane ke lie raimp band kar diya gaya to use phaansee de dee jaegee. riport ke anusaar, vinay ne kaha: “agar hamen phaansee dee jaatee hai, to desh mein balaatkaar band ho jaenge, to nishchit roop se hamen phaansee dee jaegee. lekin ye balaatkaar rukane vaale nahin hain.” riport ke anusaar, adhikaaree ne yah bhee kaha ki mukesh ko chhodakar kisee ko bhee aaropee ka chehara dekhakar nahin lagata ki 1 din baad 20 maarch ko phaansee dee gaee thee. akshay ke ghar par abhee tak nahin aaya hai bata den ki chaaron aaropee akshay, pavan, vinay aur mukesh ko 20 maarch kee subah phaansee dee jaegee. tihaad jel prashaasan ne isake lie pooree taiyaaree kar lee hai. abhiyukt, vishesh roop se pavan jalad ko usakee phaansee ke lie merath jel mein tihaad bulaaya gaya tha, jise vah mangalavaar shaam ko tihaad aaya hai. yahaan unhonne 18 maarch kee subah, 18 maarch kee subah khud ko chaar taareekhon ko phaansee par lataka liya. yah jaanakaaree tihaad jel ke adhikaaree ne nyooj ejensee enaee ko dee hai. akhabaar kee riport ke anusaar, abhee tak akshay ke parivaar ne chaar aaropiyon mein se unase mulaakaat bhee nahin kee hai. agar guruvaar ke akshay ka parivaar aaj yaatra karane ke lie aata hai, to unhen jaane kee anumati dee jaegee. isake alaava, guruvaar ko dopahar 12 baje tak ek naee adaalat kee kaarravaee par vichaar kiya jaega. mukesh, vinay ke parivaar ne unase mulaakaat kee hai.

पूर्व CJI रंजन गोगोई ने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली, विपक्ष द्वारा दंगा

पूर्व CJI रंजन गोगोई ने राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली, विपक्ष द्वारा दंगा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रंजन गोगोई ने आज संसद में राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली है। जिस दौरान विपक्षी सांसद बाहर चले गए।

 

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रंजन गोगोई ने आज संसद में राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली है। पूर्व राष्ट्रपति जस्टिस रंजन गोगोई ने गुरुवार को राज्यसभा सदस्य के रूप में विपक्षी सदस्यों के एक शपथ ग्रहण में शपथ ली है। हालांकि, इसके बाद विपक्षी सांसद बाहर चले गए।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई अपनी पत्नी के साथ राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेने के लिए संसद भवन पहुंचे थे। शपथ लेने से पहले, रंजन गोगोई को राज्यसभा सदस्य के रूप में नामांकन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में हनी पूर्णमाशी किश्वर द्वारा चुनौती दी गई थी। हनी किश्वर ने बिना किसी कानूनी प्रतिनिधित्व के एक कानूनी प्रतिनिधि की अपील पर मांग की है कि संविधान का मूल आधार ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ है और इसे लोकतंत्र का शांत माना जाता है।

वास्तव में, जैसे ही गोगोई प्रतिनिधि सभा की शुरुआत में शपथ ग्रहण की स्थिति में पहुंचे, विपक्षी सदस्य चिल्लाने लगे। इस पर, राज्य के राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने कहा कि इस तरह का सुझाव सदस्यों के आदेश के समान नहीं है। गोगोई को तब अराम के सदस्य के रूप में शपथ दिलाई गई थी। हालांकि, विपक्षी सदस्य भी बैठक से बाहर चले गए। पूर्व जेआई रंजन गोगोई को हाल ही में राष्ट्रपति ने राज्यसभा सदस्य के रूप में स्वीकार किया था।
राज्यसभा सदस्य के रूप में रंजन गोगोई के नामांकन के खिलाफ याचिका में कहा गया है कि न्यायपालिका में देश के नागरिकों का विश्वास मजबूत है। ऐसी कोई भी कार्रवाई जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है, जैसा कि वर्तमान मामले में है जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा के लिए नामित किया गया है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवरोध है।

फाइल फोटो।


इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने राज्यसभा के लिए नामित किया, जहाँ विपक्ष आपत्तिजनक है। इसमें रंजन गोगोई ने कहा, पहले मुझे शपथ लेने दें फिर मैं मीडिया से इस बारे में विस्तार से बात करूंगा कि मैंने इसे क्यों स्वीकार किया और मैं राज्यसभा क्यों जा रहा हूं।

रंजन गोगोई के नामांकन के बाद, कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला, कपिल सिब्बल और एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाए, जबकि पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिंह को उम्मीद थी कि गोगोई का प्रस्ताव उन्हें दिया जाएगा। हालांकि, रंजन गोगोई पहले ही मीडिया से बातचीत में कह चुके हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।

रंजन गोगोई, 12 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के तीन अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में, भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश – दिवा मिश्रा के रूप में सार्वजनिक रूप से पूछताछ की गई थी। उसके बाद वे मुख्य न्यायाधीश बने और राम मंदिर से सबरीमाला तक सभी मामलों में ऐतिहासिक फैसले दिए।
रिटायर होने से पहले कई बड़े फैसले लें

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपनी सेवानिवृत्ति से पहले कई बड़े फैसले किए, जिनमें से एक था राहेल डील। पिछले साल, शीर्ष अदालत ने ट्रिपल तालक की तरह अयोध्या में बड़े फैसले किए। ये ऐसे मुद्दे थे जो लंबे समय से चल रहे थे। गोगोई का 17 नवंबर, 2019 को अदालत में अंतिम दिन था। रास्ते में, मुख्य न्यायाधीश ने उन ऐतिहासिक फैसलों को सुनाया जिन्हें लोग लंबे समय तक याद रखेंगे। मुस्लिम महिलाओं के हित को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने ट्रिपल तालक पर शासन किया। इसके अलावा, सबरीमाला मंदिर पर प्रतिबंध लगाने, RTI के तहत मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय, सरकारी विज्ञापनों और सरकारी विज्ञापनों में नेताओं के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने जैसे मुद्दों पर निर्णय लिया गया।
जिस तरह से पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने काम किया था, उस पर सवाल उठाया गया था

CJI गोगोई चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों में से थे जिन्होंने जनवरी 2018 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा) के कामकाज पर सवाल उठाए थे। न्यायमूर्ति गोगोई और सुप्रीम कोर्ट के तीन अन्य न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति जे चेल्मेश्वर, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने एक संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया जिसमें आरोप लगाया गया कि सर्वोच्च न्यायालय में ठीक से प्रशासित और मुकदमा नहीं चलाया गया।

CJI के रूप में जस्टिस गोगोई का कार्यकाल अप्राप्त नहीं था। उन्हें यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करना पड़ा। हालाँकि, इसमें उन्हें क्लीन चिट घोषित किया गया था। न्यायमूर्ति एस.ओ. उन्हें बॉबी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति ने मामले में ‘क्लीन चिट’ दी थी। न्यायमूर्ति गोगोई को अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद नामक विवाद मामले पर अपने फैसले के लिए याद किया जाता है। उन्होंने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला अबप्पा मंदिर में प्रवेश की अनुमति देने के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिकाओं का भी उल्लेख किया।

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supreem kort ke poorv jastis ranjan gogoee ne aaj sansad mein raajyasabha saansad ke roop mein shapath lee hai. poorv raashtrapati jastis ranjan gogoee ne guruvaar ko raajyasabha sadasy ke roop mein vipakshee sadasyon ke ek shapath grahan mein shapath lee hai. haalaanki, isake baad vipakshee saansad baahar chale gae. poorv mukhy nyaayaadheesh ranjan gogoee apanee patnee ke saath raajyasabha saansad ke roop mein shapath lene ke lie sansad bhavan pahunche the. shapath lene se pahale, ranjan gogoee ko raajyasabha sadasy ke roop mein naamaankan ke khilaaph supreem kort mein hanee poornamaashee kishvar dvaara chunautee dee gaee thee. hanee kishvar ne bina kisee kaanoonee pratinidhitv ke ek kaanoonee pratinidhi kee apeel par maang kee hai ki sanvidhaan ka mool aadhaar nyaayapaalika kee svatantrata hai aur ise lokatantr ka shaant maana jaata hai. vaastav mein, jaise hee gogoee pratinidhi sabha kee shuruaat mein shapath grahan kee sthiti mein pahunche, vipakshee sadasy chillaane lage. is par, raajy ke raashtrapati em venkaiya naayadoo ne kaha ki is tarah ka sujhaav sadasyon ke aadesh ke samaan nahin hai. gogoee ko tab araam ke sadasy ke roop mein shapath dilaee gaee thee. haalaanki, vipakshee sadasy bhee baithak se baahar chale gae. poorv jeaee ranjan gogoee ko haal hee mein raashtrapati ne raajyasabha sadasy ke roop mein sveekaar kiya tha. raajyasabha sadasy ke roop mein ranjan gogoee ke naamaankan ke khilaaph yaachika mein kaha gaya hai ki nyaayapaalika mein desh ke naagarikon ka vishvaas majaboot hai. aisee koee bhee kaarravaee jo nyaayapaalika kee svatantrata ko pratikool roop se prabhaavit karatee hai, jaisa ki vartamaan maamale mein hai jab poorv mukhy nyaayaadheesh ko raajyasabha ke lie naamit kiya gaya hai, nyaayapaalika kee svatantrata ke lie ek bahut hee mahatvapoorn avarodh hai. phail photo. is beech, supreem kort ke poorv mukhy nyaayaadheesh ranjan gogoee ko raashtrapati raam naath kovind ne raajyasabha ke lie naamit kiya, jahaan vipaksh aapattijanak hai. isamen ranjan gogoee ne kaha, pahale mujhe shapath lene den phir main meediya se is baare mein vistaar se baat karoonga ki mainne ise kyon sveekaar kiya aur main raajyasabha kyon ja raha hoon. ranjan gogoee ke naamaankan ke baad, kaangres ke ranadeep sinh surajevaala, kapil sibbal aur eaeeemaeeem ke asaduddeen ovaisee ne savaal uthae, jabaki poorv vitt mantree yashavant sinh ko ummeed thee ki gogoee ka prastaav unhen diya jaega. haalaanki, ranjan gogoee pahale hee meediya se baatacheet mein kah chuke hain ki unhonne raashtrapati ke prastaav ko sveekaar kar liya hai. ranjan gogoee, 12 janavaree, 2018 ko supreem kort ke teen any varishth nyaayaadheeshon ke saath ek sanyukt sanvaadadaata sammelan mein, bhaarat ke tatkaaleen mukhy nyaayaadheesh – diva mishra ke roop mein saarvajanik roop se poochhataachh kee gaee thee. usake baad ve mukhy nyaayaadheesh bane aur raam mandir se sabareemaala tak sabhee maamalon mein aitihaasik phaisale die. ritaayar hone se pahale kaee bade phaisale len poorv mukhy nyaayaadheesh ranjan gogoee ne apanee sevaanivrtti se pahale kaee bade phaisale kie, jinamen se ek tha raahel deel. pichhale saal, sheersh adaalat ne tripal taalak kee tarah ayodhya mein bade phaisale kie. ye aise mudde the jo lambe samay se chal rahe the. gogoee ka 17 navambar, 2019 ko adaalat mein antim din tha. raaste mein, mukhy nyaayaadheesh ne un aitihaasik phaisalon ko sunaaya jinhen log lambe samay tak yaad rakhenge. muslim mahilaon ke hit ko dhyaan mein rakhate hue, unhonne tripal taalak par shaasan kiya. isake alaava, sabareemaala mandir par pratibandh lagaane, rti ke tahat mukhy nyaayaadheesh ke kaaryaalay, sarakaaree vigyaapanon aur sarakaaree vigyaapanon mein netaon ke vigyaapan par pratibandh lagaane jaise muddon par nirnay liya gaya. jis tarah se poorv mukhy nyaayaadheesh ne kaam kiya tha, us par savaal uthaaya gaya tha chji gogoee chaar sabase varishth nyaayaadheeshon mein se the jinhonne janavaree 2018 mein ek pres konphrens mein tatkaaleen mukhy nyaayaadheesh (nyaayamoorti deepak mishra) ke kaamakaaj par savaal uthae the. nyaayamoorti gogoee aur supreem kort ke teen any nyaayaadheeshon, nyaayamoorti je chelmeshvar, nyaayamoorti madan bee lokur aur nyaayamoorti kuriyan joseph ne ek sanvaadadaata sammelan aayojit kiya jisamen aarop lagaaya gaya ki sarvochch nyaayaalay mein theek se prashaasit aur mukadama nahin chalaaya gaya. chji ke roop mein jastis gogoee ka kaaryakaal apraapt nahin tha. unhen yaun utpeedan ke aaropon ka saamana karana pada. haalaanki, isamen unhen kleen chit ghoshit kiya gaya tha. nyaayamoorti es.o. unhen bobee kee adhyakshata vaalee teen sadasyeey aantarik jaanch samiti ne maamale mein kleen chit dee thee. nyaayamoorti gogoee ko ayodhya raam janmabhoomi-baabaree masjid naamak vivaad maamale par apane phaisale ke lie yaad kiya jaata hai. unhonne sabhee aayu varg kee mahilaon ko sabareemaala abappa mandir mein pravesh kee anumati dene ke phaisale ke khilaaph sameeksha yaachikaon ka bhee ullekh kiya.

कोरोनावायरस: अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों को 74,000 रुपये का चेक वितरित करती है

कोरोनावायरस: अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों को 74,000 रुपये का चेक वितरित करती है

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अर्थव्यवस्था और नागरिकों को कोरोना की तबाही से बचाने के लिए एक बड़े राहत पैकेज की घोषणा की है। इस योजना के माध्यम से, अमेरिकी श्रमिकों को नकद में भुगतान किया जाएगा।

 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ट्रेजरी सचिव स्टीवन मेनुचिन ने अमेरिकी युवाओं को $ 1,000 (लगभग $ 74,000) के चेक भेजने का प्रस्ताव दिया है। इस राहत पैकेज के लिए सरकार को कुल 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च करने होंगे। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा होगा। क्योंकि इसने सैकड़ों अरबों डॉलर का निवेश किया होगा। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, इस राहत पैकेज से जुड़ी सभी जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं है।

अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व ने आर्थिक मंदी के मद्देनजर ब्याज दरों को लगभग शून्य कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने 10 से अधिक लोगों को एक साथ नहीं लाने का अनुरोध किया है। उन्होंने लोगों से घर के अंदर रहने और काम करने के लिए कहा है। स्कूल, कार्यालय, बार, रेस्तरां और कई स्टोर देश भर में बंद हैं।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह 1930 के दशक में महामंदी से निकलने का सबसे प्रभावी तरीका था। लेकिन ऐसे किसी भी कार्यक्रम के लिए कांग्रेस (संसद) के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों पार्टियों को इसके लिए मिलकर काम करना होगा।

बता दें कि अमेरिका जैसे विकसित देश में बीमारी से मरने वालों की संख्या 105 हो गई है। वहीं, कोरोना वायरस के उपकेंद्र चीन के वुहान में लगातार दूसरे दिन मंगलवार को केवल एक मामले की पुष्टि हुई।

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koronaavaayaras: amerikee sarakaar apane naagarikon ko 74,000 rupaye ka chek vitarit karatee hai
 
 

कोरोनावायरस: जैविक हथियार चीनी विशेषज्ञ ड्रग्स, परीक्षण शुरू होता है

कोरोनावायरस: जैविक हथियार चीनी विशेषज्ञ ड्रग्स, परीक्षण शुरू होता है

चीन ने कोरोनावायरस वैक्सीन का परीक्षण शुरू कर दिया है। वैक्सीन संयुक्त रूप से चीन के शीर्ष जैविक हथियार विशेषज्ञ और उनकी टीम द्वारा निर्मित है। चीन सरकार ने मंगलवार रात इसके परीक्षण को मंजूरी दे दी। टीकाकरण टीम के प्रमुख चेन वेई ने इसके परीक्षण की घोषणा की है।

 

सीसीटीवी से बात करते हुए, चीन के आधिकारिक प्रसारण चैनल, चेन वेई ने कहा कि यह कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एक प्रभावी वैज्ञानिक उपकरण साबित होने वाला था। यदि चीन ऐसा हथियार बनाने वाला पहला देश है और हमारे पास इसके लिए पेटेंट है, तो यह समझा जा सकता है कि हमारा विज्ञान कितना उन्नत है और हम कितने विशाल हैं। चीन ने कहा है कि वैक्सीन को व्यापक बनाने की तैयारी की जा रही है। एक महीने के कड़े शोध के बाद चीन कोरोना वायरस के टीके की तैयारी करता है। इसके लिए इबोला वैक्सीन का अध्ययन किया गया।

चेन चीन के शीर्ष आनुवंशिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञ भी हैं। वह टीकाकरण में माहिर हैं। जब 2003 में SARS को चीन में स्थानांतरित किया गया था, तो इसने एक विशेष स्प्रे बनाया। राज्य मीडिया ने बताया कि चेन वेई द्वारा छिड़काव के कारण लगभग 14,000 चिकित्सा कर्मचारी एसएआरएस की ठोकर से बच गए।

54 वर्षीय चेन चीन की पीपुल्स आर्मी में एक मेजर जनरल भी हैं। मीडिया जानकारी के अनुसार, वह 26 जनवरी से वुहान में कोरोना वायरस के प्रकोप के बाद टीके की तलाश में थी। चेन वी और उनकी टीम ने अस्थायी टेंट में कोरोना वायरस की पहचान करने के लिए पहली परीक्षण किट विकसित की। चीन की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने केवल 30 जनवरी को अधिग्रहण किया।

 

 

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कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या घटकर 8,000, वर्ल्ड हॉल ऑफ फेम

मरने वालों की संख्या 8,000 के आंकड़े को पार कर गई है। कोई भी देश इस मानवीय तबाही से अछूता नहीं है। दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ यह वायरस अब 130 देशों में फैल चुका है। इसने वैश्विक लॉकडाउन स्थिति पैदा की। स्कूल, कॉलेज, धार्मिक भवन, थिएटर और कई कार्यालय बंद हैं और लोग घर से काम करना पसंद कर रहे हैं।

कोरोना वायरस ने दुनिया भर में 2 मिलियन से अधिक आबादी को संक्रमित किया है और मरने वालों की संख्या 8,000 को पार कर गई है। कोई भी देश इस मानवीय तबाही से अछूता नहीं है। दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ यह वायरस अब 130 देशों में फैल चुका है। इसने वैश्विक लॉकडाउन स्थिति पैदा की। स्कूल, कॉलेज, धार्मिक भवन, थिएटर और कई कार्यालय बंद हैं और लोग घर से काम करना पसंद कर रहे हैं। आपसी नाराजगी को छोड़कर, विरोधी देश एक साथ एक रणनीति बनाने पर सहमत हो रहे हैं, जबकि अमेरिका और चीन जैसे देश हैं जिनसे कोरोना ने लड़ने और हावी होने के लिए नए हथियार दिए हैं। आपको बता दें कि कोरोना दुनियाभर में रिपोर्ट …
कोरोना में एशिया की तुलना में यूरोप में अधिक मौतें होती हैं

यूरोप में कोरोनरी वायरस के संक्रमण से मरने वालों की संख्या एशिया में मरने वालों की संख्या से भी अधिक हो गई है। कोरोना वायरस ने यूरोप में 3,421 लोगों की जान ली है, जबकि एशिया में 3,384 लोगों की मौत हुई है। महामारी का मुख्य कारण चीन था। चीन में संक्रमित लोगों की संख्या 80,894 है और मरने वालों की संख्या 3237 है। 69,000 से अधिक लोग उपचार के बाद घर लौट आए हैं, इसलिए 2622 लोग गंभीर स्थिति में हैं। यूरोप के मुख्य केंद्र इटली और स्पेन हैं, जहां इसने बुजुर्ग आबादी को अपने कब्जे में ले लिया है। अकेले इटली में, वायरस ने ढाई हजार लोगों की जान ली, जबकि स्पेन में 600 लोगों की मौत हुई।
अन्य यूरोपीय देशों में, जर्मनी में 27, फ्रांस में 175, स्विटजरलैंड में 27, ब्रिटेन में 71, नीदरलैंड में 43, नॉर्वे में 3, बेल्जियम में 14, स्वीडन में 8, डेनमार्क में 4 की मृत्यु हुई।

यूरोप की सीमाओं पर ठंड

कोरोना पर अंकुश लगाने के लिए यूरोप में कड़े नियंत्रणों के बीच लोग अपने घरों से भाग रहे हैं, जिसके कारण यूरोप के विभिन्न स्थानों पर लंबे जाम लग गए हैं। कई ट्रकों के साथ मीलों को जाम कर दिया जाता है, जो आवश्यक आपूर्ति करता है। लोग ऑस्ट्रिया में फंस गए हैं जबकि हंगरी रात में लोगों को निकालने के लिए अपनी सीमाएं खोलता है। इस समय के दौरान, बल्गेरियाई लोगों को पहले जाने की अनुमति थी और फिर रोमानिया आया। दूसरी ओर, ऑस्ट्रियाई सीमा पर बड़ी संख्या में ट्रक छह हैं। ट्रक पंक्तियों में 28 किमी लंबे हैं जबकि कारें 14 किमी लंबी हैं।

यूरोपीय संघ संकट में

यूरोपीय संघ संकट के दौरान माल की कमी की अनुमति नहीं देना चाहता है, यह सुनिश्चित करता है कि भोजन, चिकित्सा आपूर्ति और आवश्यक आपूर्ति की कमी नहीं है। यूरोपीय संघ किसानों को मौसमी फल और सब्जियां उगाने के लिए प्रोत्साहित करने की भी कोशिश कर रहा है, क्योंकि वे नहीं जानते कि संकट कब तक जारी रहेगा।

भारत में कम भारतीय, विदेशों में अधिक भारतीय संचारित

भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 151 है। लेकिन संक्रमित भारतीयों की कुल संख्या और भी अधिक है। वास्तव में, ईरान और इटली में भारतीय नागरिक हैं, और पहले पांच जो कोरोना से स्थानांतरित किए गए हैं, दोनों देशों में शामिल हैं। वहां रहने वाले भारतीय भी इसका शिकार हुए हैं। कहा जाता है कि भारत के बाहर 276 लोग कोरोना से संक्रमित हैं। विदेश मंत्रालय ने बुधवार को यह आंकड़ा जारी किया।

लोकसभा में एक सवाल के जवाब में, विदेश मंत्री वी। मुरली राव ने कहा कि वर्तमान में 276 भारतीय कोरोना वायरस से संक्रमित हैं। ईरान में सबसे ज्यादा 255 मामले हैं। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में 12, इटली में 5, हांगकांग, कुवैत, रवांडा और श्रीलंका में एक-एक लोग वायरस से संक्रमित हैं।

विश्व बैंक ने पाकिस्तान में अस्पताल की कमी के कारण मदद की मांग की

पाकिस्तान अतीत में कोरोना धीमा कर रहा था लेकिन जैसे ही ये आंकड़े 200 के पार हो गए, उसने स्थिति को समझा और अब इमरान सरकार ने तैयार किया है। इमरान ने खुद स्वीकार किया है कि यदि वायरस तेजी से फैलता है। इसे रोक नहीं सकते। इसे देखते हुए विश्व बैंक ने 200 मिलियन डॉलर की सहायता मांगी है। पाकिस्तान सरकार और विश्व बैंक के बीच बातचीत चल रही है और इस्लामाबाद को उम्मीद है कि विश्व बैंक कम से कम 140 मिलियन की मदद करेगा।

ईरान में मामले कम नहीं हो रहे हैं

ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने बुधवार को कोरोना वायरस से लड़ने के लिए अपनी सरकार के कदमों का बचाव किया। रूहानी ने महामारी से निपटने में धीमी कार्रवाई के लिए अधिकारियों की व्यापक आलोचना को खारिज कर दिया। ईरान पश्चिम एशिया में वायरस से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से है, जहां मरने वालों की संख्या 1,135 तक पहुंच गई है। अपने मंत्रिमंडल में एक भाषण में रूहानी ने कहा कि सरकार ने इस मुद्दे पर देश के लोगों के साथ ईमानदारी से बात की थी और इसमें कोई देरी नहीं हुई। रूहानी ने कहा, ‘मस्जिदों और अभयारण्यों को बंद करना मुश्किल था, लेकिन हमने किया। यह एक धार्मिक कर्तव्य था।

शेयर बाजार में तेजी: सेंसेक्स 1709 अंक नीचे, डूब – 5.5 मिलियन

शेयर बाजार में कोरोना वायरस का प्रकोप जारी है। लगातार तीसरे दिन सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए। सेंसेक्स 1709.58 अंक या 5.59 प्रतिशत की गिरावट के साथ 28,869.51 अंक पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी 425.55 अंक या 4.75 प्रतिशत गिरकर 8,541.50 पर बंद हुआ। सेंसेक्स में 28 शेयर लाल निशान पर बंद हुए, जबकि निफ्टी में 6 शेयर हरे रंग में बंद हुए। डॉ फ्यूचर्स गिर गए, जिससे बाजार बिगड़ गया। आज के कारोबार में, सेक्टरल इंडेक्स, निफ्टी मीडिया में सब कुछ अलग हो रहा था। बैंकिंग, ऑटो, वित्तीय सेवाएं, मेटल, फार्मा, रियल्टी सेक्टर सबसे ज्यादा नुकसान में रहे। बाजार की गिरावट के कारण निवेशकों को 5.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है।

 

5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश
एक बार फिर, बाजार में मंदी के कारण निवेशकों को एक झटका लगा है। निवेशकों ने बुधवार को 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की। बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप मंगलवार को 1,19,52,066.11 करोड़ रुपये था, जो आज 5,68,436.93 करोड़ रुपये से घटकर 1,13,83,629.18 करोड़ रुपये रह गया।

ग्लोबल डिप्रेशन

कोरोना वायरस के कारण दुनिया एक बड़े आर्थिक मंदी की ओर अग्रसर है। एसएंडपी ने भारत के विकास का अनुमान लगाया है। इसी समय, चीन और जापान के विकास का एसएंडपी अनुमान भी गिरा है। एसएंडपी ने 2020 के लिए भारत के विकास के अनुमान को 5.2 प्रतिशत से घटाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है, जबकि चीन का विकास पूर्वानुमान 4.8 प्रतिशत से घटकर 2.9 प्रतिशत हो गया है। इसी समय, जापान की वृद्धि 0.4% से घटकर -1.2% होने का अनुमान है।

इंडसइंड बैंक में भारी गिरावट

इंडसइंड बैंक में 30 फीसदी की गिरावट आई। शेयर 6 साल के निचले स्तर पर देखे जा रहे हैं। इंडसइंड बैंक ने 3 महीनों में 73 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की। बैंक ने कहा कि बाजार में अफवाह फैलाई जा रही है। बैंक मजबूत स्थिति में है।

 

 

Stock market boom: Sensex down 1709 points, sinks — 5.5 million

कोरोना वायरस – कोरोना के मरीज जापानी दवा से 4 दिनों में ठीक हो जाते हैं

कोरोना वायरस - कोरोना के मरीज जापानी दवा से 4 दिनों में ठीक हो जाते हैं

कोरोना वायरस दुनिया भर में 2 मिलियन से अधिक लोगों को संक्रमित कर चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार, कोरोना वैक्सीन को विकसित होने में अधिक समय लग सकता है। दूसरी ओर, चीन का दावा है कि कोरोनरी रोगियों के इलाज में एक जापानी दवा बहुत उपयोगी साबित हो रही है।



गार्जियन में एपी की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय में काम करने वाले यांग फिनमिन ने कहा है कि जापानी लोग जो सामान्य फ्लू के इलाज के लिए इस दवा का उपयोग करते हैं, कोरोनरी संक्रमण के रोगियों के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार यह फ्यूजीमिल की दवा कंपनी भाववीर द्वारा निर्मित है। शेन्ज़ेन, वुहान में इस दवा का उपयोग करके 340 से अधिक कोरोनरी रोगियों को ठीक किया गया है। यांग के अनुसार, इस बात के पक्के सबूत हैं कि यह दवा बाकी की तुलना में ज्यादा कारगर साबित हुई है।

 

वायरस को जल्दी नियंत्रित करता है

 

यांग ने कहा कि दवा बाकी की तुलना में तेजी से काम कर रही है। जब यह दवा उन रोगियों को दी गई जो कोरोनरी-पॉजिटिव पाए गए थे, तो वे केवल चार दिन बाद परीक्षण में नकारात्मक पाए गए थे। वर्तमान में उपयोग की जा रही बाकी दवाएं 11 दिनों के भीतर प्रभावी होने लगी हैं। इसका इस्तेमाल करने से फेफड़ों पर कोरोना का असर 91% तक जल्दी ठीक हो जाता है। जबकि अन्य दवाओं में, यह केवल 62% है।

इस दवा को बनाने वाली जापानी कंपनी फुजीफिल्म टोयामा केमिकल को एविगन के नाम से जाना जाता है। जापान के वैज्ञानिकों ने कोरोना उपचार खोजने के लिए एक ही दवा का उपयोग कर रहे हैं, यांग ने कहा। हालाँकि, जापान ने कहा कि इस दवा का कोरोनरी धमनी रोगियों में सामान्य रोगी की तरह प्रभाव नहीं है।

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Corona virus – Corona patients recover from Japanese medicine in 4 days

दो बच्चों की माँ ने संकट में दुनिया को निष्कासित करने के लिए जानलेवा कोरोना वायरस वैक्सीन टेस्ट का जोखिम उठाया।

संयुक्त राज्य अमेरिका सहित दुनिया भर के कई देशों में कोरोना वायरस के मामले बढ़ रहे हैं। अमेरिका ने कोरोना वैक्सीन की जांच की है। सिएटल में एक महिला को डॉक्टर ने पहला कोविद -19 टीका लगाया। महिला का नाम जेनिफर होलर है। जेनिफर और उनके 44 लोगों ने स्वेच्छा से मानव जाति को संकट से बचाने के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया। जेनिफर के दो बच्चे हैं और फिर भी वह इस घटना से अवगत हैं, वैक्सीन इस पूरी प्रतिक्रिया का जवाब देने में विफल रहती है, जिससे उनका जीवन खतरे में पड़ सकता है।

The mother of two puts herself in danger to get the world out of crisis: the corona virus vaccine test.
The mother of two puts herself in danger to get the world out of crisis: the corona virus vaccine test.

जेनिफर हेलर (43) एक टेक्नोलॉजी कंपनी में ऑपरेशन मैनेजर के रूप में काम करती हैं। “हम सभी बहुत असहाय महसूस कर रहे हैं,” उन्होंने कहा। यह मेरे लिए कुछ करने का शानदार मौका है। उसने कहा कि उसकी दो बेटियों का मानना ​​है कि अध्ययन में भाग लेना अच्छा है। वाल्टर रीड आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च सहित कई देशों में संभावित कोविद -19 टीके विकसित किए जा रहे हैं।

जेनिफर के दो बच्चे –

43 साल की जेनिफर हॉवलर के दो बच्चे हैं। जेनिफर ने अपना पहला टीका प्राप्त किया। वैक्सीन परीक्षण के पहले इंजेक्शन के बाद, जेनिफर ने अपनी खुशी व्यक्त की और कहा, “मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।” जेनिफर हॉलर हर सुबह अपने सेब काटती हैं और अपने 16 साल के बेटे और 13 साल की बेटी को खिलाती हैं। अब उनके बच्चे खुद खाना बनाते और खाते हैं। बच्चों के स्कूल जाने से पहले वह काम पर जाती है।
पति की नौकरी चली गई

उनके पति एक सॉफ्टवेयर टेस्टर हैं जिन्होंने पिछले हफ्ते अपनी नौकरी खो दी थी। इससे परिवार की आमदनी आधी हो जाएगी। वर्तमान स्थिति में नौकरी पाना भी मुश्किल है। जेनिफर कहती हैं, “मुझे लगता है कि हमें उसे काम करने के लिए छह महीने के लिए तैयार होना पड़ सकता है।”

जेनिफर सिएटल की एक छोटी टेक्नोलॉजी कंपनी में ऑपरेशन मैनेजर के रूप में काम करती हैं। उन्होंने 3 मार्च को फेसबुक के माध्यम से वैक्सीन की खोज का सीखा। वाशिंगटन रिसर्च इंस्टीट्यूट ने भर्ती शुरू की और उन्होंने तुरंत फॉर्म भर दिया। दो दिन बाद, उन्हें एक अनजान नंबर से सर्च टीम का फोन आया।

इस बीच, बॉलीवुड के गीतकार मनोज मंताशीर ने जेनिफर के बारे में ट्वीट करते हुए कहा कि जेनिफर होलर ने कोरोना वायरस के टीके की जांच करवाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी है। स्त्री के साहस पर कभी संदेह न करें।

अन्य जिन्होंने टेस्ट वैक्सीन लिया

जेनिफर हेलर के साथ दो अन्य लोगों ने एक परीक्षण टीका प्राप्त किया। जिन नाम माइक्रोसॉफ्ट में 46 वर्षीय नेटवर्क इंजीनियर और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के ग्लोबल हेल्थ रिसर्च सेंटर में 25 वर्षीय संपादकीय समन्वयक हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने लोगों की मदद के लिए इस मार्ग को चुना है। अभी, वे घर से काम करने के बजाय वायरस से लड़कर अपना जीवन बिताना चाहते हैं।
इंजेक्शन के बाद क्या हुआ

टीके लगवाने वाले तीन लोगों का कहना है कि वे सामान्य फ्लू के टीके से पीड़ित हैं। इनमें से कुछ लोगों को यह देखने के लिए सख्त खुराक दी जाएगी कि अधिकतम सीमा क्या हो सकती है। प्रतिकूल प्रभावों का असर उन पर भी दिखेगा। यह भी देखा जाएगा कि उनका प्रतिरोध क्या है। इन स्वयंसेवकों का कहना है कि उनकी खुद की रक्षा करने की मंशा नहीं है। वह कहते हैं कि हमारी भूमिका छोटी है और यह प्रयास 18 महीने तक सफल रहता है और दुनिया को लाभ पहुंचाता है।
संभावित वैक्सीन की पुष्टि करने में एक साल से 18 महीने तक का समय लगेगा

अमेरिकी सरकार के एक अधिकारी के अनुसार, कोरोना वायरस के टीके का टीका सोमवार से शुरू किया गया है। वह बताते हैं कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) परीक्षण का वित्तपोषण कर रहा है और वाशिंगटन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान में सिएटल के कैसर परमानेंटे ले रहा है। सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि किसी भी संभावित टीकाकरण की पुष्टि करने में एक साल से 18 महीने का समय लगेगा। 45 युवा और स्वस्थ स्वयंसेवकों के साथ परीक्षण शुरू हुआ।
संयुक्त राज्य अमेरिका में 100 से अधिक लोग मारे जाते हैं

अमेरिका जैसे विकसित देश में, इस वायरल बीमारी वाले लोगों की संख्या बढ़कर 105 हो गई है और वायरस सभी 50 राज्यों में फैल गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अर्थव्यवस्था को राहत देने के लिए एक अरब डॉलर से अधिक के पैकेज सहित स्थिति को संभालने के प्रयास तेज कर दिए हैं।

आखिर मध्य प्रदेश की सियासत में अरुणाचल प्रदेश का ज़िक्र क्यों? जाने आज की मुख खभर

मध्य प्रदेश की राजनीति पल-पल बदल रही है. बीजेपी 16 मार्च को सदन में फ्लोर टेस्ट करवाना चाह रही थी लेकिन विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थागित कर दी गई और वजह कोरोना वायरस बताई गई.

राज्यपाल लालजी टंडन अपना अभिभाषण पढ़ने की जगह मध्य प्रदेश के गौरव का ध्यान रखने और सब लोगों से अपना कर्तव्य निभाने की बात कहकर अपने आसन से उठकर चले गए.

इसके बाद बीजेपी नेता शिवराज सिंह चौहान समर्थक विधायकों की सूची लेकर और बसों में विधायकों को लेकर राज्पयापल के पास पहुँचे, इसके बाद राज्यपाल ने कहा कि नियमों का पालन होगा, उन्होंने भाजपा विधायकों को आश्वसान दिया कि वे निश्चिंत रहें, उनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे.

कुछ दिन पहले कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफा देने की बाद कमलनाथ सरकार पर संकट आ गया था.

कांग्रेस से बाग़ी हुये सदस्य अभी भी बेंगलुरु में है. उन्हें और 10 दिन तक संभालकर रखना भाजपा के लिए मुश्किल होता. अगले कदम के तौर पर भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिस पर सुनवाई मंगलवार को होनी है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोमवार को विधानसभा सत्र शुरु होने से ठीक पहले, राज्यपाल को पत्र लिखकर अरुणाचल प्रदेश के एक मामले का ज़िक्र था.

पत्र में उन्होंने लिखा, “किसी राजनीतिक दल की गतिविधियां जो कि उनके आंतरिक कलह या भेदभाव से संबंधित हों यह राज्यपाल के लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए.”

दरअसल, जिस मामले का उन्होंने ज़िक्र किया था वो 13 जुलाई 2016 का मामला है जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था (Nabam Rebia And Etc.Vs Deputy Speaker).

अरुणाचल प्रदेश में क्या हुआ था?

अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में 2016 में ठीक इसी तरह की स्थिति बन चुकी है, जैसी आज मध्य प्रदेश विधानसभा की है.

अरुणाचल प्रदेश में सत्ता हासिल करने के एक साल के भीतर ही कांग्रेसी मुख्यमंत्री नबाम तुकी को पार्टी के भीतर असंतोष का सामना करना पड़ रहा था. रिपोर्टों के मुताबिक़ 27 विद्रोही विधायक उन्हें पद से हटवाने के लिए दिल्ली में कैंप कर रहे थे जिनमें से 21 ने उनके ख़िलाफ़ दस्तख़त भी कर दिए थे.

यदि ये 21 भाजपा से मिल जाते हैं तो अरुणाचल विधानसभा में तुकी सरकार की हार तय थी. हालांकि अरुणाचल विधानसभा का शीत सत्र 2016 में मध्य जनवरी में शुरू होना था. लेकिन राज्यपाल ने शीत सत्र से एक महीना पहले यानी 15 दिसंबर 2015 को ही हस्तक्षेप कर दिया. उनके इस क़दम को राज्य में विद्रोही कांग्रेसी विधायकों की मदद से बीजेपी सरकार गठित करवाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा था.

उस वक्त प्रदेश के राज्यपाल ने बहुमत परीक्षण के आदेश मुख्यमंत्री नबाम तुकी को दिये थे.

इसके बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था. इस मामले में अरुणाचल प्रदेश के स्पीकर नबम रेबिया ने सुप्रीम कोर्ट में ईटानगर हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी जिसमें उस वक़्त के राज्यपाल जेपी राजखोआ ने विधानसभा के सत्र को एक महीने पहले बुला लिया था और उसे सही ठहराया गया था.

राज्यपाल ने विपक्ष के सदन के अध्यक्ष नबाम रेबिया को हटाने के प्रस्ताव को शीत सत्र का पहला एजेंडा भी बना दिया. हालांकि विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया ने 16 दिसंबर को सदन की कार्रवाई ही नहीं होने दी. उन्होंने 21 बाग़ी विधायकों में से 14 को दलबदल क़ानून के तहत निलंबित करने का दावा भी किया था.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने का अधिकार नहीं था. वह ग़ैर-कानूनी था.

इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था और कांग्रेस की नबाम तुकी की सरकार संकट में फंस गई थी. 21 विधायक के बाग़ी होने के बाद उनकी पार्टी के 47 में से सिर्फ 26 विधायक रह गये थे.

हालांकि इसके बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला तुकी के ख़िलाफ ही दिया जब उन्होंने दूसरी सरकार बनने से रोकने की याचिका को नामंजूर कर दिया था.

इसके बाद नाराज़ हुए कालिखो ने बागी विधायकों और भाजपा विधायकों के साथ सरकार बना लगी थी.

मध्यप्रदेश विधानसभा में फिलहाल क्या है स्थिति

मध्य प्रदेश में स्थिति अरुणाचल की तरह ही बनती नज़र आ रही है. कांग्रेस का मानना है कि बाग़ी हुए विधायक अगर बाहर आते हैं तो वह उनके साथ ही खड़े नज़र आएँगे.

वहीं भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री और स्पीकर ने राज्यपाल के आदेश की अवहेलना की है.

लेकिन यह तय है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिये आगे का रास्ता आसान नज़र नहीं आ रहा है. लेकिन अगर अरुणाचल प्रदेश के मामलें को देखे तो केंद्र सरकार के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना भी आसान नहीं होगा.