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मध्य प्रदेश की राजनीति पल-पल बदल रही है. बीजेपी 16 मार्च को सदन में फ्लोर टेस्ट करवाना चाह रही थी लेकिन विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थागित कर दी गई और वजह कोरोना वायरस बताई गई.

राज्यपाल लालजी टंडन अपना अभिभाषण पढ़ने की जगह मध्य प्रदेश के गौरव का ध्यान रखने और सब लोगों से अपना कर्तव्य निभाने की बात कहकर अपने आसन से उठकर चले गए.

इसके बाद बीजेपी नेता शिवराज सिंह चौहान समर्थक विधायकों की सूची लेकर और बसों में विधायकों को लेकर राज्पयापल के पास पहुँचे, इसके बाद राज्यपाल ने कहा कि नियमों का पालन होगा, उन्होंने भाजपा विधायकों को आश्वसान दिया कि वे निश्चिंत रहें, उनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे.

कुछ दिन पहले कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफा देने की बाद कमलनाथ सरकार पर संकट आ गया था.

कांग्रेस से बाग़ी हुये सदस्य अभी भी बेंगलुरु में है. उन्हें और 10 दिन तक संभालकर रखना भाजपा के लिए मुश्किल होता. अगले कदम के तौर पर भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिस पर सुनवाई मंगलवार को होनी है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोमवार को विधानसभा सत्र शुरु होने से ठीक पहले, राज्यपाल को पत्र लिखकर अरुणाचल प्रदेश के एक मामले का ज़िक्र था.

पत्र में उन्होंने लिखा, “किसी राजनीतिक दल की गतिविधियां जो कि उनके आंतरिक कलह या भेदभाव से संबंधित हों यह राज्यपाल के लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए.”

दरअसल, जिस मामले का उन्होंने ज़िक्र किया था वो 13 जुलाई 2016 का मामला है जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था (Nabam Rebia And Etc.Vs Deputy Speaker).

अरुणाचल प्रदेश में क्या हुआ था?

अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में 2016 में ठीक इसी तरह की स्थिति बन चुकी है, जैसी आज मध्य प्रदेश विधानसभा की है.

अरुणाचल प्रदेश में सत्ता हासिल करने के एक साल के भीतर ही कांग्रेसी मुख्यमंत्री नबाम तुकी को पार्टी के भीतर असंतोष का सामना करना पड़ रहा था. रिपोर्टों के मुताबिक़ 27 विद्रोही विधायक उन्हें पद से हटवाने के लिए दिल्ली में कैंप कर रहे थे जिनमें से 21 ने उनके ख़िलाफ़ दस्तख़त भी कर दिए थे.

यदि ये 21 भाजपा से मिल जाते हैं तो अरुणाचल विधानसभा में तुकी सरकार की हार तय थी. हालांकि अरुणाचल विधानसभा का शीत सत्र 2016 में मध्य जनवरी में शुरू होना था. लेकिन राज्यपाल ने शीत सत्र से एक महीना पहले यानी 15 दिसंबर 2015 को ही हस्तक्षेप कर दिया. उनके इस क़दम को राज्य में विद्रोही कांग्रेसी विधायकों की मदद से बीजेपी सरकार गठित करवाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा था.

उस वक्त प्रदेश के राज्यपाल ने बहुमत परीक्षण के आदेश मुख्यमंत्री नबाम तुकी को दिये थे.

इसके बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था. इस मामले में अरुणाचल प्रदेश के स्पीकर नबम रेबिया ने सुप्रीम कोर्ट में ईटानगर हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी जिसमें उस वक़्त के राज्यपाल जेपी राजखोआ ने विधानसभा के सत्र को एक महीने पहले बुला लिया था और उसे सही ठहराया गया था.

राज्यपाल ने विपक्ष के सदन के अध्यक्ष नबाम रेबिया को हटाने के प्रस्ताव को शीत सत्र का पहला एजेंडा भी बना दिया. हालांकि विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया ने 16 दिसंबर को सदन की कार्रवाई ही नहीं होने दी. उन्होंने 21 बाग़ी विधायकों में से 14 को दलबदल क़ानून के तहत निलंबित करने का दावा भी किया था.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने का अधिकार नहीं था. वह ग़ैर-कानूनी था.

इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था और कांग्रेस की नबाम तुकी की सरकार संकट में फंस गई थी. 21 विधायक के बाग़ी होने के बाद उनकी पार्टी के 47 में से सिर्फ 26 विधायक रह गये थे.

हालांकि इसके बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला तुकी के ख़िलाफ ही दिया जब उन्होंने दूसरी सरकार बनने से रोकने की याचिका को नामंजूर कर दिया था.

इसके बाद नाराज़ हुए कालिखो ने बागी विधायकों और भाजपा विधायकों के साथ सरकार बना लगी थी.

मध्यप्रदेश विधानसभा में फिलहाल क्या है स्थिति

मध्य प्रदेश में स्थिति अरुणाचल की तरह ही बनती नज़र आ रही है. कांग्रेस का मानना है कि बाग़ी हुए विधायक अगर बाहर आते हैं तो वह उनके साथ ही खड़े नज़र आएँगे.

वहीं भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री और स्पीकर ने राज्यपाल के आदेश की अवहेलना की है.

लेकिन यह तय है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिये आगे का रास्ता आसान नज़र नहीं आ रहा है. लेकिन अगर अरुणाचल प्रदेश के मामलें को देखे तो केंद्र सरकार के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना भी आसान नहीं होगा.